भाग २: मुख्य पाठ (कहानी का एक-एक शब्द)
यह विडंबना की ही बात है कि इस युग में भी 'जातिवाद' के पोषकों की कमी नहीं है। इसके पोषक कई आधारों पर इसका समर्थन करते हैं। समर्थन का एक आधार यह कहा जाता है कि आधुनिक सभ्य समाज 'कार्य-कुशलता' के लिए श्रम-विभाजन को आवश्यक मानता है, और चूंकि जाति प्रथा भी श्रम-विभाजन का ही दूसरा रूप है, इसलिए इसमें कोई बुराई नहीं है। इस तर्क के संबंध में पहली बात तो यही आपत्तिजनक है कि जाति प्रथा श्रम-विभाजन के साथ-साथ 'श्रमिक-विभाजन' का भी रूप लिए हुए है। श्रम-विभाजन निश्चय ही सभ्य समाज की आवश्यकता है, परंतु किसी भी सभ्य समाज में श्रम-विभाजन की व्यवस्था श्रमिकों का विभिन्न वर्गों में अस्वाभाविक विभाजन नहीं करती। भारत की जाति प्रथा की एक और विशेषता यह है कि यह श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन ही नहीं करती, बल्कि विभाजित विभिन्न वर्गों को एक-दूसरे की अपेक्षा ऊंच-नीच भी करार देती है, जो कि विश्व के किसी भी समाज में नहीं पाया जाता।
जाति प्रथा को यदि श्रम-विभाजन मान लिया जाए, तो यह स्वाभाविक विभाजन नहीं है, क्योंकि यह मनुष्य की रुचि पर आधारित नहीं है। कुशल व्यक्ति या सक्षम श्रमिक-समाज का निर्माण करने के लिए यह आवश्यक है कि हम व्यक्तियों की क्षमता इस सीमा तक विकसित करें जिससे वह अपना पेशा या कार्य का चुनाव स्वयं कर सके। इस सिद्धांत के विपरीत जाति प्रथा का दूषित सिद्धांत यह है कि इससे मनुष्य का पेशा उसके माता-पिता के सामाजिक स्तर के अनुसार, गर्भधारण के समय से ही निर्धारित कर दिया जाता है।
जाति प्रथा पेशे का दोषपूर्ण पूर्वनिर्धारण ही नहीं करती, बल्कि मनुष्य को जीवन-भर के लिए एक ही पेशे में बांध भी देती है। भले ही पेशा अनुपयुक्त या अपर्याप्त होने के कारण वह भूखो मर जाए। आधुनिक युग में यह स्थिति प्रायः आती है, क्योंकि उद्योग-धंधों की प्रक्रिया व तकनीक में निरंतर विकास और कभी-कभी अकस्मात परिवर्तन हो जाता है, जिसके कारण मनुष्य को अपना पेशा बदलने की आवश्यकता पड़ सकती है और यदि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मनुष्य को अपना पेशा बदलने की स्वतंत्रता न हो, तो इसके लिए भूखों मरने के अलावा क्या चारा रह जाता है? हिंदू धर्म की जाति प्रथा किसी भी व्यक्ति को ऐसा पेशा चुनने की अनुमति नहीं देती है जो उसका पैतृक पेशा न हो, भले ही वह उसमें पारंगत हो। इस प्रकार पेशा-परिवर्तन की अनुमति न देकर जाति प्रथा भारत में बेरोजगारी का एक प्रमुख व प्रत्यक्ष कारण बनी हुई है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि श्रम-विभाजन की दृष्टि से भी जाति प्रथा गंभीर दोषों से युक्त है। जाति प्रथा का श्रम-विभाजन मनुष्य की स्वेच्छा पर निर्भर नहीं रहता। मनुष्य की व्यक्तिगत भावना तथा व्यक्तिगत रुचि का इसमें कोई स्थान या महत्व नहीं रहता। इस आधार पर हमें यह स्वीकार करना पड़ेगा कि आज के उद्योगों में गरीबी और उत्पीड़न इतनी बड़ी समस्या नहीं, जितनी यह कि बहुत से लोग निर्धारित कार्य को अरुचि के साथ केवल विवशतावश करते हैं। ऐसी स्थिति स्वभावतः मनुष्य को दुर्भावना से ग्रस्त रहकर टालू काम करने और कम काम करने के लिए प्रेरित करती है। ऐसी स्थिति में जहाँ काम करने वालों का न दिल लगता हो न दिमाग, कोई कुशलता कैसे प्राप्त की जा सकती है? अतः यह निर्विवाद रूप से सिद्ध हो जाता है कि आर्थिक पहलू से भी जाति प्रथा एक हानिकारक प्रथा है, क्योंकि यह मनुष्य की स्वाभाविक प्रेरणा, रुचि व आत्म-शक्ति को दबाकर उन्हें अस्वाभाविक नियमों में जकड़कर निष्क्रिय बना देती है।
अब मैं समस्या के रचनात्मक पहलू को लेता हूँ। मेरे द्वारा जाति प्रथा की आलोचना सुनकर आप लोग मुझसे यह प्रश्न पूछना चाहेंगे कि यदि मैं जातियों के विरुद्ध हूँ, तो मेरी दृष्टि में आदर्श समाज क्या है? मेरा उत्तर होगा कि मेरा आदर्श समाज स्वतंत्रता, समता, भ्रातृत्व (भाईचारे) पर आधारित होगा। क्या यह ठीक नहीं है? भ्रातृत्व अर्थात भाईचारे में किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? किसी भी आदर्श समाज में इतनी गतिशीलता होनी चाहिए जिससे कोई भी वांछित परिवर्तन समाज के एक छोर से दूसरे छोर तक संचारित हो सके। ऐसे समाज के बहुविध हितों में सबका भाग होना चाहिए तथा सबको उनकी रक्षा के प्रति सजग रहना चाहिए। सामाजिक जीवन में अबाध संपर्क के अनेक साधन व अवसर उपलब्ध होने चाहिए। तात्पर्य यह है कि दूध-पानी के मिश्रण की तरह भाईचारे का यही वास्तविक रूप है, और इसी का दूसरा नाम 'लोकतंत्र' है। क्योंकि लोकतंत्र केवल शासन की एक पद्धति ही नहीं है, लोकतंत्र मूलतः सामूहिक जीवन-चर्या की एक रीति तथा समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान का नाम है। इसमें यह आवश्यक है कि अपने साथियों के प्रति श्रद्धा व सम्मान का भाव हो।
इसी के साथ, जब हम स्वतंत्रता पर विचार करते हैं, तो आवागमन की स्वतंत्रता, जीवन तथा शारीरिक सुरक्षा की स्वतंत्रता पर किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती। संपत्ति के अधिकार, जीविकोपार्जन के लिए आवश्यक औजार और सामग्री रखने के अधिकार जिससे शरीर को स्वस्थ रखा जा सके, के अर्थ में भी स्वतंत्रता पर कोई आपत्ति नहीं हो सकती। तो फिर जाति प्रथा के समर्थक स्वतंत्रता का विरोध क्यों करते हैं? वे मनुष्य को अपना पेशा चुनने की स्वतंत्रता देने को तैयार नहीं हैं, क्योंकि इस स्वतंत्रता का अर्थ होगा उन्हें दासता में जकड़कर रखना। दासता केवल कानूनी पराधीनता को ही नहीं कहा जा सकता। दासता में वह स्थिति भी सम्मिलित है जिससे कुछ व्यक्तियों को दूसरे लोगों द्वारा निर्धारित व्यवहार और कर्तव्यों का पालन करने के लिए विवश होना पड़ता है। यह स्थिति कानूनी पराधीनता न होने पर भी जाति प्रथा जैसी व्यवस्थाओं में पाई जाती है।
अब फ्रांसीसी क्रांति के नारे में 'समता' शब्द पर विचार करें। जाति प्रथा के समर्थक समता का भी विरोध करते हैं। उनका कहना है कि सभी मनुष्य बराबर नहीं होते। यह तथ्य होते हुए भी इसका कोई विशेष महत्व नहीं है, क्योंकि समता एक काल्पनिक वस्तु है। मनुष्य की क्षमता ३ बातों पर निर्भर करती है—(१) शारीरिक वंश-परंपरा, (२) सामाजिक उत्तराधिकार अर्थात माता-पिता की कल्याण-कामना, शिक्षा, वैज्ञानिक ज्ञानार्जन आदि, और (३) मनुष्य के अपने प्रयत्न। इन तीनों कारणों से मनुष्य असमान होते हैं। तो क्या इन असमानताओं के कारण समाज को भी उनके साथ असमान व्यवहार करना चाहिए? समता का विरोध करने वालों के पास इसका कोई जवाब नहीं है। एक राजनीतिज्ञ का पाला बहुत बड़ी जनसंख्या से पड़ता है, उसके पास हर व्यक्ति के लिए अलग व्यवहार करने का समय नहीं होता। इसलिए वह एक व्यावहारिक सिद्धांत अपनाता है कि 'सभी मनुष्यों के साथ समान व्यवहार किया जाए'। अतः समता एक व्यावहारिक सिद्धांत है, और इसी आधार पर एक आदर्श समाज का निर्माण हो सकता है।