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बिहार बोर्ड कक्षा 10वीं हिंदी | गोधूलि भाग 2

अध्याय 11: नौबतखाने में इबादत

लेखक: यतीन्द्र मिश्र (व्यक्ति-चित्र)
न्यू स्टैंडअलोन डिजिटल संस्करण

भाग १: लेखक परिचय

जन्म तिथि बारह अप्रैल उन्नीस सौ सतहत्तर (12 अप्रैल 1977 ई०)
जन्म स्थान अयोध्या, उत्तर प्रदेश
मुख्य पहचान सांस्कृतिक चिंतक, कवि, संगीतज्ञ और कला समीक्षक
प्रमुख सम्मान भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, भारतीय भाषा परिषद युवा पुरस्कार, राजीव गांधी राष्ट्रीय एकता पुरस्कार

हिंदी के प्रसिद्ध कवि, संपादक और सांस्कृतिक अध्येता यतीन्द्र मिश्र का जन्म १२ अप्रैल उन्नीस सौ सतहत्तर (1977 ई०) में उत्तर प्रदेश के पवित्र शहर अयोध्या में हुआ था। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एम० ए० किया। यतीन्द्र मिश्र जी का झुकाव बचपन से ही संगीत, नृत्य और अभिनय जैसी ललित कलाओं की तरफ रहा है। उन्होंने अयोध्या से ही अर्धवार्षिक पत्रिका 'सहित' का संपादन शुरू किया और 'विमला देवी फाउंडेशन' के जरिए कला और संगीत की निरंतर कड़क और निस्वार्थ सेवा कर रहे हैं।

मिश्र जी की भाषा शैली में अवध की सांस्कृतिक मिठास और शास्त्रीय कलाओं की गहरी समझ साफ़ झलकती है। उन्होंने महान पार्श्वगायक लता मंगेशकर, ठुमरी साम्राज्ञी गिरिजा देवी और शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान के जीवन पर बहुत ही अनूठे और ऐतिहासिक शोध ग्रंथ लिखे हैं।

उनकी प्रमुख कृतियों में: यदा-कदा, अयोध्या तथा अन्य कविताएँ, ड्योढ़ी पर आलाप जैसे शानदार काव्य-संग्रह; तथा गिरिजा (ठुमरी गायिका गिरिजा देवी के जीवन पर), देवप्रिया (सोनाल मानसिंह पर), सुर की इबादत आदि सांस्कृतिक ग्रंथ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

प्रस्तुत पाठ 'नौबतखाने में इबादत' एक बहुत ही सुंदर और कड़क 'व्यक्ति-चित्र' (Biography Sketch) है। इस पाठ में लेखक ने भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान के जीवन, उनके संगीत के प्रति कड़े समर्पण, काशी की साझी गंगा-जमुनी संस्कृति और उनकी शहनाई की जादुई दुनिया का बहुत ही मार्मिक वर्णन किया है। बिहार बोर्ड कक्षा 10वीं के छात्रों को यह पाठ धार्मिक एकता, सादगी और अपनी कला के प्रति सच्ची साधना की एक बहुत ही कड़क और अनमोल शिक्षा देता है।

कवि यतीन्द्र मिश्र
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भाग २: मुख्य पाठ (व्यक्ति-चित्र का एक-एक शब्द)

उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान का असली नाम 'अमीरुद्दीन' था। उनका जन्म बिहार के एक छोटे से गाँव डुमराँव में एक संगीतकार परिवार में हुआ था। उनके बड़े भाई का नाम शम्सुद्दीन था। जब अमीरुद्दीन केवल छह वर्ष के थे, तब वे अपने ननिहाल काशी (बनारस) आ गए। उनके मामा सादिक अली और अली बख्श ख़ान काशी के प्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर में शहनाई बजाने वाले कड़क और नामचीन उस्ताद थे। अमीरुद्दीन का बचपन काशी के इसी संगीतमय माहौल में बीता, जहाँ सुबह की शुरुआत ही नौबतखाने से उठने वाली शहनाई की पवित्र धुनों से होती थी।

अमीरुद्दीन (बिस्मिल्लाह ख़ान) को बचपन में संगीत की तरफ मोड़ने में काशी की दो गायिका बहनों—रसूलनबाई और बतुलनबाई का बहुत बड़ा हाथ था। जब वे छोटे थे, तो उनके घर जाने वाले रास्ते से गुज़रते समय रसूलनबाई और बतुलनबाई के कंठ से निकलने वाली ठुमरी और टप्पे की कड़क धुनें उनके कानों में रस घोल देती थीं। बिस्मिल्लाह ख़ान ने बड़े गर्व से स्वीकार किया है कि उनके जीवन में संगीत की पहली कड़क प्रेरणा इन्हीं दो बहनों के गीतों से मिली थी। वे बचपन में बालाजी के मंदिर में जाकर रोज़ घंटों कड़ा रियाज़ करते थे।

💡 खान साहब का संदेश (खुदा से सुर की भीख)

"उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान भारत रत्न मिलने के बाद भी एक फटी हुई लुंगिया पहनते थे। जब उनकी शिष्या ने उनसे कहा कि बाबा आपको इतना बड़ा सम्मान मिला है, आप ऐसी फटी लुंगिया मत पहना करें, तो उन्होंने मुस्कुराकर एक बहुत ही कड़क बात कही थी: 'धत! पगली, ई भारत रत्न हमको शहनाई पर मिला है, लुंगिया पर नहीं। खुदा से रोज़ यही दुआ मांगते हैं कि फटा सुर न बख्शें, लुंगिया का क्या है, आज फटी है तो कल सिल जाएगी।' वे मुहर्रम में रोते भी थे और बाबा विश्वनाथ के दरबार में शीश भी नवाते थे। यही असली साझी संस्कृति है।"

शहनाई और डुमराँव का एक बहुत ही गहरा ऐतिहासिक संबंध है। शहनाई बजाने के लिए जिस 'रीड' (नरकट) का प्रयोग किया जाता है, वह मुख्य रूप से डुमराँव में सोन नदी के किनारे ही पाई जाती है। इसी नरकट की बदौलत आज पूरी दुनिया में शहनाई गूँज रही है। बिस्मिल्लाह ख़ान जब भी काशी से बाहर किसी बड़े शहर या विदेश में प्रोग्राम करने जाते थे, तो वे मंच पर बैठने से पहले कुछ पल के लिए काशी और बाबा विश्वनाथ के मंदिर की दिशा में मुँह करके अपनी शहनाई को ज़रूर नमन करते थे। उनके दिल में काशी के प्रति अगाध प्रेम और कड़ा आदर था। वे कहते थे कि गंगा मैया और विश्वनाथ के बिना उनकी शहनाई अधूरी है।

व्यक्ति-चित्र के अंत में लेखक स्पष्ट करते हैं कि उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान केवल एक संगीतकार नहीं थे, बल्कि वे भारत की साझी संस्कृति, धार्मिक सद्भाव और सादगी के जीती-जागती मिसाल थे। अस्सी वर्ष की उम्र तक पाँचों वक्त की नमाज़ में वे केवल एक ही चीज़ मांगते थे—'सच्चा सुर'। उन्हें अपनी कला पर कभी अहंकार नहीं हुआ। २१ अगस्त दो हजार छह (2006 ई०) को ९२ वर्ष की आयु में इस महान संगीत के देवता का निधन हो गया। वे आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी शहनाई की कड़क और पवित्र गूँज अमर है और सदियों तक देश के युवाओं को प्रेरणा देती रहेगी।

भाग ३: पाठ के अंत के प्रश्न-उत्तर (Bihar Board Exam Exercises)

💡 प्रत्येक प्रश्न के नीचे दिए गए बटन पर क्लिक करके बिहार बोर्ड परीक्षा मानक के अनुकूल उत्तर प्राप्त करें और उनका निरंतर अभ्यास करें।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

शहनाई और डुमराँव का संबंध अत्यंत गहरा है। शहनाई बजाने के लिए जिस 'रीड' (नरकट) का प्रयोग किया जाता है, वह मुख्य रूप से डुमराँव में सोन नदी के किनारे ही उगती है। साथ ही शहनाई के सरताज उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान का जन्म भी इसी डुमराँव गाँव में हुआ था। इसलिए शहनाई वादन के इतिहास में डुमराँव का स्थान अत्यंत कड़क और महत्वपूर्ण है।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

बिस्मिल्लाह ख़ान को संगीत की पहली प्रेरणा उनके ननिहाल काशी में रहने वाली दो संगीतकार बहनों—रसूलनबाई और बतुलनबाई से मिली थी। बचपन में जब वे उनके घर के रास्ते से गुज़रते थे, तो उनके कंठ से निकलने वाले कड़क शास्त्रीय संगीत, ठुमरी और टप्पे की धुनें सुनकर ख़ान साहब के मन में संगीत के प्रति गहरा अनुराग पैदा हुआ।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

बिस्मिल्लाह ख़ान जब भी काशी से बाहर देश या विदेश में कहीं प्रोग्राम करते थे, तो वे मंच पर बैठने से पहले कुछ पल के लिए काशी और बाबा विश्वनाथ मंदिर की दिशा में मुँह करके अपनी शहनाई को नमन करते थे। इससे हमें यह कड़क सीख मिलती है कि हमें सफलता की कितनी भी ऊंचाइयों पर पहुँचने के बाद अपनी मातृभूमि और अपनी जड़ों को कभी नहीं भूलना चाहिए।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

इस कथन का आशय यह है कि उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान के लिए बाहरी चमक-धमक और भौतिक धन-दौलत का कोई मूल्य नहीं था। वे भारत रत्न जैसे सर्वोच्च सम्मान मिलने के बाद भी अत्यंत सादगी से रहते थे। उनका मानना था कि इंसान का पहनावा भले ही साधारण या फटा हो, लेकिन उसकी कला और उसका सुर हमेशा पवित्र, कड़क और अटूट होना चाहिए। कला की गरिमा कपड़ों से कहीं बढ़कर है।

भाग ४: शब्दार्थ (कठिन शब्दों के अर्थ)

नौबतखाना किसी बड़े मंदिर या महल के मुख्य दरवाज़े के ऊपर बना वह कमरा जहाँ सुबह-शाम शहनाई और नगाड़े बजाए जाते हैं।
इबादत सच्चे दिल से की जाने वाली प्रार्थना, पूजा या खुदा की बंदगी।
शागिर्द शिष्य, चेला या कला सीखने वाला छात्र।
रीड (नरकट) एक खोखली घास या पौधा जिससे शहनाई के अंदर फूंक मारने वाली नली बनाई जाती है।
सद्भाव आपसी प्रेम, भाईचारा और अच्छा व्यवहार।
अगाध बहुत गहरा, जिसकी गहराई का अंदाज़ा न लगाया जा सके (जैसे अगाध प्रेम)।