भाग २: मुख्य पाठ (व्यक्ति-चित्र का एक-एक शब्द)
उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान का असली नाम 'अमीरुद्दीन' था। उनका जन्म बिहार के एक छोटे से गाँव डुमराँव में एक संगीतकार परिवार में हुआ था। उनके बड़े भाई का नाम शम्सुद्दीन था। जब अमीरुद्दीन केवल छह वर्ष के थे, तब वे अपने ननिहाल काशी (बनारस) आ गए। उनके मामा सादिक अली और अली बख्श ख़ान काशी के प्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर में शहनाई बजाने वाले कड़क और नामचीन उस्ताद थे। अमीरुद्दीन का बचपन काशी के इसी संगीतमय माहौल में बीता, जहाँ सुबह की शुरुआत ही नौबतखाने से उठने वाली शहनाई की पवित्र धुनों से होती थी।
अमीरुद्दीन (बिस्मिल्लाह ख़ान) को बचपन में संगीत की तरफ मोड़ने में काशी की दो गायिका बहनों—रसूलनबाई और बतुलनबाई का बहुत बड़ा हाथ था। जब वे छोटे थे, तो उनके घर जाने वाले रास्ते से गुज़रते समय रसूलनबाई और बतुलनबाई के कंठ से निकलने वाली ठुमरी और टप्पे की कड़क धुनें उनके कानों में रस घोल देती थीं। बिस्मिल्लाह ख़ान ने बड़े गर्व से स्वीकार किया है कि उनके जीवन में संगीत की पहली कड़क प्रेरणा इन्हीं दो बहनों के गीतों से मिली थी। वे बचपन में बालाजी के मंदिर में जाकर रोज़ घंटों कड़ा रियाज़ करते थे।
"उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान भारत रत्न मिलने के बाद भी एक फटी हुई लुंगिया पहनते थे। जब उनकी शिष्या ने उनसे कहा कि बाबा आपको इतना बड़ा सम्मान मिला है, आप ऐसी फटी लुंगिया मत पहना करें, तो उन्होंने मुस्कुराकर एक बहुत ही कड़क बात कही थी: 'धत! पगली, ई भारत रत्न हमको शहनाई पर मिला है, लुंगिया पर नहीं। खुदा से रोज़ यही दुआ मांगते हैं कि फटा सुर न बख्शें, लुंगिया का क्या है, आज फटी है तो कल सिल जाएगी।' वे मुहर्रम में रोते भी थे और बाबा विश्वनाथ के दरबार में शीश भी नवाते थे। यही असली साझी संस्कृति है।"
शहनाई और डुमराँव का एक बहुत ही गहरा ऐतिहासिक संबंध है। शहनाई बजाने के लिए जिस 'रीड' (नरकट) का प्रयोग किया जाता है, वह मुख्य रूप से डुमराँव में सोन नदी के किनारे ही पाई जाती है। इसी नरकट की बदौलत आज पूरी दुनिया में शहनाई गूँज रही है। बिस्मिल्लाह ख़ान जब भी काशी से बाहर किसी बड़े शहर या विदेश में प्रोग्राम करने जाते थे, तो वे मंच पर बैठने से पहले कुछ पल के लिए काशी और बाबा विश्वनाथ के मंदिर की दिशा में मुँह करके अपनी शहनाई को ज़रूर नमन करते थे। उनके दिल में काशी के प्रति अगाध प्रेम और कड़ा आदर था। वे कहते थे कि गंगा मैया और विश्वनाथ के बिना उनकी शहनाई अधूरी है।
व्यक्ति-चित्र के अंत में लेखक स्पष्ट करते हैं कि उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान केवल एक संगीतकार नहीं थे, बल्कि वे भारत की साझी संस्कृति, धार्मिक सद्भाव और सादगी के जीती-जागती मिसाल थे। अस्सी वर्ष की उम्र तक पाँचों वक्त की नमाज़ में वे केवल एक ही चीज़ मांगते थे—'सच्चा सुर'। उन्हें अपनी कला पर कभी अहंकार नहीं हुआ। २१ अगस्त दो हजार छह (2006 ई०) को ९२ वर्ष की आयु में इस महान संगीत के देवता का निधन हो गया। वे आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी शहनाई की कड़क और पवित्र गूँज अमर है और सदियों तक देश के युवाओं को प्रेरणा देती रहेगी।