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बिहार बोर्ड कक्षा 10वीं हिंदी | गोधूलि भाग 2

अध्याय 12: शिक्षा और संस्कृति

लेखक: राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी (वैचारिक निबंध)
न्यू स्टैंडअलोन डिजिटल संस्करण

भाग १: लेखक परिचय

जन्म तिथि दो अक्टूबर अट्ठारह सौ उनहत्तर (2 अक्टूबर 1869 ई०)
जन्म स्थान पोरबंदर, गुजरात
पिता व माता करमचंद गाँधी और पुतलीबाई
शहादत (निधन) तीस जनवरी उन्नीस सौ अड़तालीस (30 जनवरी 1948 ई०), दिल्ली

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी (मोहनदास करमचंद गाँधी) का जन्म २ अक्टूबर अट्ठारह सौ उनहत्तर (1869 ई०) में गुजरात के पोरबंदर नामक स्थान पर हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा पोरबंदर और राजकोट में हुई। उनका विवाह सन् अट्ठारह सौ बयासी (1882 ई०) में कस्तूरबा से हुआ। वे अट्ठारह सौ अठासी (1888 ई०) में कानून (वकालत) की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए और वहाँ से बैरिस्टर बनकर लौटे। सन् अट्ठारह सौ तिरानवे (1893 ई०) से उन्नीस सौ चौदह (1914 ई०) तक वे दक्षिण अफ्रीका में रहे, जहाँ उन्होंने नस्लभेद के खिलाफ 'सत्याग्रह' का पहला सफल प्रयोग किया।

सन् उन्नीस सौ पंद्रह (1915 ई०) में भारत लौटने के बाद गाँधी जी ने पूरे देश के स्वाधीनता संग्राम का कड़क नेतृत्व किया। उन्होंने सत्य और अहिंसा को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया। उनके नेतृत्व में असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन जैसे महान स्वतंत्रता संग्राम लड़े गए, जिसके कारण अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाना पड़ा। रवींद्रनाथ ठाकुर ने उन्हें सबसे पहले 'महात्मा' की उपाधि दी थी।

गाँधी जी एक महान लेखक और पत्रकार भी थे। उनके द्वारा संपादित पत्रिकाओं में हरिजन, यंग इंडिया तथा उनकी विश्वप्रसिद्ध आत्मकथा सत्य के प्रयोग (My Experiments with Truth) और हिंद स्वराज्य पूरी दुनिया के पाठकों के लिए एक अनमोल वैचारिक खजाना हैं। ३० जनवरी उन्नीस सौ अड़तालीस (1948 ई०) को नई दिल्ली में नाथूराम गोडसे ने उनकी हत्या कर दी।

प्रस्तुत पाठ 'शिक्षा और संस्कृति' गाँधी जी के बुनियादी शिक्षा और सांस्कृतिक विचारों का एक अत्यंत कड़क और उत्कृष्ट संग्रह है। इस निबंध में उन्होंने बताया है कि असली शिक्षा केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और भीतरी संस्कृति का विकास है। बिहार बोर्ड कक्षा 10वीं के छात्रों के लिए अपने जीवन के नैतिक मूल्यों को मजबूत करने और सच्चे नागरिक बनने के लिए यह अंतिम पाठ पढ़ना अत्यंत अनिवार्य और गौरवमयी है।

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी
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भाग २: मुख्य पाठ (निबंध का एक-एक शब्द)

महात्मा गाँधी जी का मानना है कि 'बुनियादी शिक्षा' (Basic Education) ही मनुष्य को एक नेक और स्वावलंबी इंसान बना सकती है। वे कहते हैं कि केवल अक्षर ज्ञान या किताबी पढ़ाई को शिक्षा नहीं कहा जा सकता। अक्षर ज्ञान तो केवल एक साधन है जिसके जरिए पुरुष और स्त्रियों को शिक्षित किया जाता है। असली शिक्षा तो वह है जो बच्चे के शरीर, बुद्धि और आत्मा के उत्तम गुणों को बाहर निकाले और उन्हें निखारे। इसलिए वे चाहते थे कि बच्चों की शिक्षा की शुरुआत किसी कड़क और उपयोगी दस्तकारी (हस्तशिल्प या हुनर) को सिखाने के साथ होनी चाहिए, ताकि बच्चे पढ़ाई के साथ-साथ आत्मनिर्भर बनना सीख सकें।

गाँधी जी 'अहिंसक प्रतिरोध' (सत्याग्रह) को अक्षरों की पढ़ाई से कहीं अधिक कड़क और मूल्यवान शिक्षा मानते थे। उनका कहना था कि बच्चों को अक्षर ज्ञान देने से पहले प्रेम, सत्य, करुणा और अपनी आत्मा की शक्ति का ज्ञान होना चाहिए। यदि बच्चा यह समझ जाए कि अन्याय का सामना सत्य और अहिंसा से कैसे किया जाता है, तो वह जीवन की हर कड़क परीक्षा में बहुत ही आसानी से सफल हो जाएगा। चरित्र निर्माण ही शिक्षा का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए, क्योंकि यदि चरित्र मजबूत है, तो समाज खुद-ब-खुद सशक्त हो जाएगा।

💡 गाँधी जी का अमर कथन (सांस्कृतिक खुलापन)

"मैं नहीं चाहता कि मेरे घर के चारों तरफ दीवारें खड़ी कर दी जाएं और मेरी खिड़कियाँ बंद कर दी जाएं। मैं चाहता हूँ कि सभी देशों की संस्कृतियों की कड़क हवा मेरे घर के चारों तरफ पूरी आज़ादी से बहे, लेकिन मैं यह कभी बर्दाश्त नहीं करूँगा कि वह हवा मेरे पैरों को अपनी ही जमीन से उखाड़ दे। अपनी संस्कृति की जड़ों पर मजबूती से टिके रहकर दूसरों के अच्छे गुणों को अपनाना ही सच्ची संस्कृति है।"

विदेशी भाषाओं की पढ़ाई और पश्चिमी अंधानुकरण पर गहरी चिंता जताते हुए गाँधी जी कहते हैं कि बच्चों को उनकी 'मातृभाषा' में ही शिक्षा दी जानी चाहिए। अंग्रेजी भाषा को जबरन थोपना बच्चों के मानसिक विकास को पंगु बना देता है। वे कहते हैं कि विदेशी भाषा सीखने में जो कीमती वर्ष बर्बाद होते हैं, उस समय में हमारे बच्चे अपनी संस्कृति और इतिहास से कट जाते हैं। वे अंग्रेजी सीखने के विरोधी नहीं थे, लेकिन उनका मत कड़क था कि पहले अपनी मातृभाषा और राष्ट्रभाषा पर पूरा अधिकार होना चाहिए, उसके बाद ही किसी दूसरी भाषा के साहित्य को समझना चाहिए।

निबंध के अंत में राष्ट्रपिता स्पष्ट करते हैं कि भारतीय संस्कृति कोई जड़ या स्थिर चीज़ नहीं है, बल्कि यह अत्यंत उदार, सहिष्णु और विशाल है। इसमें दुनिया की सभी संस्कृतियों को अपने अंदर समाहित करने की गज़ब की भीतरी शक्ति है। हमारी संस्कृति हमें त्याग, भाईचारा और शांति का संदेश देती है। कोई भी संस्कृति तब तक जिंदा नहीं रह सकती जब तक वह दूसरों का बहिष्कार करने की कोशिश करती है। हमें अपनी धरोहर पर पूरा गर्व होना चाहिए और शिक्षा को इसी सांस्कृतिक गौरव के साथ जोड़कर आगे बढ़ाना चाहिए।

भाग ३: पाठ के अंत के प्रश्न-उत्तर (Bihar Board Exam Exercises)

💡 प्रत्येक प्रश्न के नीचे दिए गए बटन पर क्लिक करके बिहार बोर्ड परीक्षा मानक के अनुकूल उत्तर प्राप्त करें और उनका निरंतर अभ्यास करें।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

गाँधी जी के अनुसार, केवल अक्षर ज्ञान या किताबी पढ़ाई बढ़िया शिक्षा नहीं है। वे 'बुनियादी शिक्षा' (दस्तकारी या हुनर सीखने) को सबसे बढ़िया शिक्षा मानते थे, जो मनुष्य के शरीर, बुद्धि और आत्मा का संतुलित विकास करे और उसे आत्मनिर्भर व चरित्रवान बनाए।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

गाँधी जी बच्चों को दस्तकारी सिखाना इसलिए ज़रूरी मानते थे क्योंकि इससे बच्चों का बौद्धिक और शारीरिक विकास एक साथ होता है। वे पढ़ाई के दौरान ही उत्पादन करना सीखते हैं, जिससे उनके भीतर श्रम के प्रति कड़ा आदर पैदा होता है और वे भविष्य में पूरी तरह आत्मनिर्भर बनते हैं।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

गाँधी जी चाहते थे कि सभी देशों की संस्कृतियों की अच्छी और ज्ञानवर्धक हवा उनके घर के चारों तरफ पूरी आज़ादी से बहे। वे किसी भी संस्कृति का बहिष्कार नहीं करना चाहते थे, लेकिन उनका कड़ा मत था कि हमें दूसरी संस्कृतियों को सीखते समय अपने संस्कारों और अपनी ज़मीन को कभी नहीं छोड़ना चाहिए।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

गाँधी जी का मानना था कि साक्षरता या किताबी ज्ञान तो केवल एक साधन है, लेकिन असली साध्य चरित्र का निर्माण है। यदि कोई व्यक्ति उच्च शिक्षित है पर उसका चरित्र कमज़ोर है, तो वह समाज का भला नहीं कर सकता। साहसी, संयमी और सदाचारी नागरिक ही एक कड़क और आदर्श राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं।

भाग ४: शब्दार्थ (कठिन शब्दों के अर्थ)

स्वावलंबन अपने पैरों पर खुद खड़ा होना, आत्मनिर्भर बनने की स्थिति।
दस्तकारी हाथ से किया जाने वाला हुनर, कला या हस्तशिल्प (Handicraft)।
बहिष्कार किसी चीज़ को पूरी तरह से त्याग देना, अलग करना या छोड़ना।
पंगु अपाहिज या कमज़ोर (यहाँ मानसिक रूप से पिछड़ने को कहा गया है)।
सहिष्णुता सहनशीलता, सभी के विचारों और धर्मों का आदर करने की भीतरी क्षमता।
प्रतिरोध अन्याय या ज़ुल्म के खिलाफ डटकर मुकाबला करना या विरोध करना।