भाग २: मुख्य पाठ (निबंध का एक-एक शब्द)
महात्मा गाँधी जी का मानना है कि 'बुनियादी शिक्षा' (Basic Education) ही मनुष्य को एक नेक और स्वावलंबी इंसान बना सकती है। वे कहते हैं कि केवल अक्षर ज्ञान या किताबी पढ़ाई को शिक्षा नहीं कहा जा सकता। अक्षर ज्ञान तो केवल एक साधन है जिसके जरिए पुरुष और स्त्रियों को शिक्षित किया जाता है। असली शिक्षा तो वह है जो बच्चे के शरीर, बुद्धि और आत्मा के उत्तम गुणों को बाहर निकाले और उन्हें निखारे। इसलिए वे चाहते थे कि बच्चों की शिक्षा की शुरुआत किसी कड़क और उपयोगी दस्तकारी (हस्तशिल्प या हुनर) को सिखाने के साथ होनी चाहिए, ताकि बच्चे पढ़ाई के साथ-साथ आत्मनिर्भर बनना सीख सकें।
गाँधी जी 'अहिंसक प्रतिरोध' (सत्याग्रह) को अक्षरों की पढ़ाई से कहीं अधिक कड़क और मूल्यवान शिक्षा मानते थे। उनका कहना था कि बच्चों को अक्षर ज्ञान देने से पहले प्रेम, सत्य, करुणा और अपनी आत्मा की शक्ति का ज्ञान होना चाहिए। यदि बच्चा यह समझ जाए कि अन्याय का सामना सत्य और अहिंसा से कैसे किया जाता है, तो वह जीवन की हर कड़क परीक्षा में बहुत ही आसानी से सफल हो जाएगा। चरित्र निर्माण ही शिक्षा का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए, क्योंकि यदि चरित्र मजबूत है, तो समाज खुद-ब-खुद सशक्त हो जाएगा।
"मैं नहीं चाहता कि मेरे घर के चारों तरफ दीवारें खड़ी कर दी जाएं और मेरी खिड़कियाँ बंद कर दी जाएं। मैं चाहता हूँ कि सभी देशों की संस्कृतियों की कड़क हवा मेरे घर के चारों तरफ पूरी आज़ादी से बहे, लेकिन मैं यह कभी बर्दाश्त नहीं करूँगा कि वह हवा मेरे पैरों को अपनी ही जमीन से उखाड़ दे। अपनी संस्कृति की जड़ों पर मजबूती से टिके रहकर दूसरों के अच्छे गुणों को अपनाना ही सच्ची संस्कृति है।"
विदेशी भाषाओं की पढ़ाई और पश्चिमी अंधानुकरण पर गहरी चिंता जताते हुए गाँधी जी कहते हैं कि बच्चों को उनकी 'मातृभाषा' में ही शिक्षा दी जानी चाहिए। अंग्रेजी भाषा को जबरन थोपना बच्चों के मानसिक विकास को पंगु बना देता है। वे कहते हैं कि विदेशी भाषा सीखने में जो कीमती वर्ष बर्बाद होते हैं, उस समय में हमारे बच्चे अपनी संस्कृति और इतिहास से कट जाते हैं। वे अंग्रेजी सीखने के विरोधी नहीं थे, लेकिन उनका मत कड़क था कि पहले अपनी मातृभाषा और राष्ट्रभाषा पर पूरा अधिकार होना चाहिए, उसके बाद ही किसी दूसरी भाषा के साहित्य को समझना चाहिए।
निबंध के अंत में राष्ट्रपिता स्पष्ट करते हैं कि भारतीय संस्कृति कोई जड़ या स्थिर चीज़ नहीं है, बल्कि यह अत्यंत उदार, सहिष्णु और विशाल है। इसमें दुनिया की सभी संस्कृतियों को अपने अंदर समाहित करने की गज़ब की भीतरी शक्ति है। हमारी संस्कृति हमें त्याग, भाईचारा और शांति का संदेश देती है। कोई भी संस्कृति तब तक जिंदा नहीं रह सकती जब तक वह दूसरों का बहिष्कार करने की कोशिश करती है। हमें अपनी धरोहर पर पूरा गर्व होना चाहिए और शिक्षा को इसी सांस्कृतिक गौरव के साथ जोड़कर आगे बढ़ाना चाहिए।