Manjit Sawasi
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बिहार बोर्ड कक्षा 10वीं हिंदी | गोधूलि भाग 2

अध्याय २: विष के दाँत

लेखक: नलिन विलोचन शर्मा
प्रामाणिक डिजिटल संस्करण

भाग १: लेखक परिचय

जन्म तिथि अठारह फरवरी उन्नीस सौ सोलह (18 फ़रवरी 1916 ई०)
जन्म स्थान बदरघाट, पटना
मूल भाषा भोजपुरी (दर्शनशास्त्र के विद्वान के पुत्र)
निधन (मृत्यु) बारह सितंबर उन्नीस सौ इकसठ (12 सितंबर 1961 ई०)

नलिन विलोचन शर्मा का जन्म 18 फरवरी 1916 ई० में पटना के बदरघाट में हुआ था। वे जन्मना भोजपुरीभाषी थे। वे दर्शन और संस्कृत के प्रख्यात विद्वान महामहोपाध्याय पंडित रामावतार शर्मा के ज्येष्ठ पुत्र थे। शर्मा जी की स्कूल की पढ़ाई पटना कॉलेजिएट स्कूल से और विश्वविद्यालय की शिक्षा पटना विश्वविद्यालय से हुई। उन्होंने वहाँ से संस्कृत और हिंदी में एम० ए० किया। वे हरप्रसाद दास जैन कॉलेज आरा, रांची विश्वविद्यालय और अंत में पटना विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के अध्यक्ष रहे और इस पद पर वे मृत्युपर्यन्त बने रहे।

हिंदी कविता में 'प्रपद्यवाद' के प्रवर्तक और नए ढंग की आलोचना के सूत्रधार शर्मा जी की लेखनी में एक अद्भुत नवीनता थी। उनके कथ्य में मध्यवर्ग के अंतर्विरोधों को उजागर करने की गहरी अंतर्दृष्टि थी। उनकी शैली और शिल्प दोनों में ही आधुनिकता के तत्व कूट-कूट कर भरे थे।

उनकी प्रमुख रचनाओं में: दृष्टिकोण, साहित्य का इतिहास-दर्शन, मानदंड, प्रेमचंद, साहित्य तत्व और आलोचना आदि आलोचनात्मक ग्रंथ; विष के दाँत, सत्रह असंग्रहीत छोटी कहानियाँ जैसे कहानी-संग्रह; और नकेन के प्रपद्य, नकेन-दो जैसे काव्य-संग्रह विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। बारह सितंबर उन्नीस सौ इकसठ (1961 ई०) को उनका आकस्मिक निधन हो गया।

प्रस्तुत कहानी 'विष के दाँत' उनके इसी नाम के कहानी-संग्रह से ली गई है। यह कहानी मध्यमवर्ग के अनेक अंतर्विरोधों को बहुत ही सजीवता से छूती है। कहानी में जहाँ एक तरफ सेन साहब की अमीरी का झूठा अहंकार और दिखावा है, वहीं दूसरी तरफ उनकी पांच लड़कियों पर कड़े नियम और इकलौते बेटे 'खोखा' पर लाड़-प्यार की अति दिखाई गई है। समाज के इस अस्वाभाविक भेदभाव को एक साधारण नौकर के बेटे मदन के स्वाभिमान के जरिए लेखक ने बहुत ही करारा जवाब दिया है। यह कहानी मनोवैज्ञानिक और सामाजिक दृष्टि से बेहद कड़क और शिक्षाप्रद है।

प्रो० नल进 विलोचन शर्मा
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भाग २: मुख्य पाठ (कहानी का एक-एक शब्द)

सेन साहब की नई मोटरकार बंगले के सामने चमचमाती हुई खड़ी थी। साढ़े सात हज़ार में आई थी। काला रंग था और ऐसी चमक कि उसमें मुँह देख लो। मजाल है कि एक धब्बा भी कहीं लग जाए! क्लीनर और सोफ़र की कड़ी हिदायत थी कि गाड़ी पर कोई उंगली न रखने पाए। सेन साहब को इस गाड़ी पर बड़ा नाज़ था और उससे भी ज्यादा नाज़ था अपने इकलौते बेटे 'खोखा' (कासू) पर। सेन साहब की पांच लड़कियाँ थीं—सीमा, रजनी, आलो, शेफ़ाली और आरती। पाँचों लड़कियाँ तमीज़ और शिष्टता की जीती-जागती मूरत थीं। उनके लिए घर में अलग नियम थे कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं, लेकिन खोखा के लिए घर के नियम कानून बिल्कुल अलग थे, क्योंकि वह तब पैदा हुआ था जब संतान की कोई उम्मीद बाकी नहीं रह गई थी। वह सेन साहब के जीवन का अपवाद था, इसलिए घर के नियमों का भी अपवाद था।

सेन साहब खोखा को एक 'इंजीनियर' बनाना चाहते थे। उनके अनुसार खोखा में अभी से ही इंजीनियर के लक्षण दिखने लगे थे। जब वह घर की किसी चीज़ या गाड़ी के कल-पुर्जों को तोड़ता, तो सेन साहब गुस्सा होने के बजाय खुश होते और अपने दोस्तों से कहते, "देखिए, वह अभी से देखना चाहता है कि इसके अंदर क्या है!" एक दिन सेन साहब के कुछ दोस्त और पत्रकार महोदय उनके बैठकखाने में बैठे थे। बातचीत के दौरान जब बच्चों की शिक्षा की बात चली, तो सेन साहब ने बड़े गर्व से कहा कि वे तो अपने बेटे को इंजीनियर या बिजनेसमैन ही बनाएंगे और इसके लिए उन्होंने अभी से घर पर कारपेंटर (बढ़ई) को बुलाकर उसे थोड़े-थोड़े कल-पुर्जों को ठोकना-पीटना सिखाने का इंतजाम कर दिया है। जब पत्रकार महोदय से उनके बच्चे के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "मैं चाहता हूँ कि मेरा बेटा सबसे पहले एक भद्र और नेक इंसान बने, बाकी वह जो चाहे बन सकता है।" सेन साहब को यह बात थोड़ी चुभ गई।

तभी बाहर अहाते में एक बड़ा हंगामा खड़ा हो गया। सेन साहब का नौकर गिरधरलाल, जो उनकी फैक्ट्री में मामूली किरानी था, अपने पांच-छह साल के बेटे मदन को डांट रहा था। हुआ यह था कि मदन कौतूहलवश सेन साहब की नई चमचमाती गाड़ी को छूने की कोशिश कर रहा था, तभी सोफ़र (ड्राइवर) ने उसे जोर से झिड़क दिया और ढकेल दिया, जिससे मदन को घुटने में चोट लग गई। मदन की माँ ड्राइवर से उलझ पड़ी। जब सेन साहब बाहर आए, तो उन्होंने मदन की माँ को कड़ी डांट पिलाई और गिरधरलाल को बुलाकर कहा, "गिरधर, अपने बेटे को संभालो। ऐसे ही लड़के आगे चलकर गुंडे, चोर और डाकू बनते हैं।" स्वाभिमानी गिरधरलाल अपना सा मुँह लेकर रह गया और रात को उसने घर जाकर मदन की खूब पिटाई की, जिसकी आवाज़ सेन साहब के बंगले तक आ रही थी।

💡 लेखक का तीखा व्यंग्य (अमीरी बनाम स्वाभिमान)

"यह लड़ाई महल और झोपड़ी की लड़ाई थी। इसमें महल वालों ने झोपड़ी वाले पर अपनी ताकत का रोब जमाया। लेखक ने अमीर बाप के बिगड़े हुए लाडले खोखा को 'बंगले का पिल्लू' और गरीब लेकिन स्वाभिमानी मदन को 'गली का आवारा कुत्ता' कहकर समाज के इस गहरे आर्थिक अंतर और झूठे अहंकार पर बहुत ही करारा तंज कसा है।"

इसके कुछ दिनों बाद, एक शाम मदन गली में पड़ोस के आवारा लड़कों के साथ लट्टू नचा रहा था। तभी वहाँ सेन साहब का लाडला खोखा (कासू) रौब जमाते हुए आ पहुँचा और मदन से बोला, "हमको भी लट्टू दो, हम भी खेलेंगे।" मदन के दिल में उस दिन की बेइज्जती की आग अभी बुझी नहीं थी। उसने साफ मना कर दिया, "भाग यहाँ से, बड़ा आया लट्टू खेलने वाला! जा अपने पापा की गाड़ी पर बैठ।" खोखा को घर में कभी 'ना' सुनने की आदत नहीं थी, उसे बड़ा गुस्सा आया। उसने मदन को एक घूंसा जड़ दिया। मदन भी कहाँ पीछे हटने वाला था, उसने आव देखा न ताव, खोखा पर झपट पड़ा। गली के बीच दोनों बच्चों में कड़क दंगल शुरू हो गया। झोपड़ी के लड़के ने महल के लाडले की ऐसी धुनाई की कि खोखा के दो-दो आगे के दाँत टूट गए। खोखा रोता हुआ अपने बंगले की तरफ भागा।

रात को मदन बहुत डरा हुआ था। उसे लग रहा था कि आज जब उसके पिता गिरधरलाल को पता चलेगा कि उसने सेन साहब के बेटे के दाँत तोड़ दिए हैं, तो उसकी खाल ही उधेड़ दी जाएगी। वह डरते-डरते रात के सन्नाटे में रसोई के रास्ते घर के अंदर घुसने लगा, तभी उसका पैर एक बर्तन से टकरा गया और ज़ोर की आवाज़ हुई। गिरधरलाल बत्ती जलाकर बाहर आया। मदन सहम गया और अपनी आँखें बंद कर लीं कि अब मार पड़ने वाली है। लेकिन गिरधरलाल ने मदन को पीटने के बजाय दौड़कर उसे अपनी गोद में उठा लिया और खुशी से चिल्ला उठा, "वाह बेटे! तूने तो कमाल कर दिया। जो काम मैं जिंदगी भर नहीं कर सका, वह तूने एक पल में कर दिया। तूने सेन साहब के अमीर अहंकार के विष के दाँत ही तोड़ डाले!" उस रात गिरधरलाल के झोपड़े से मार की नहीं, बल्कि एक गर्व और आज़ादी की हँसी गूँज रही थी।

भाग ३: पाठ के अंत के प्रश्न-उत्तर (Bihar Board Exam Exercises)

💡 प्रत्येक प्रश्न के नीचे दिए गए बटन पर क्लिक करके बिहार बोर्ड परीक्षा मानक के अनुकूल उत्तर प्राप्त करें और उनका निरंतर अभ्यास करें।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

यह शीर्षक पूरी तरह सार्थक है। सेन साहब का बेटा खोखा अपनी अमीरी के घमंड में चूर होकर गरीबों का शोषण करता था। मदन द्वारा लड़ाई में खोखा के दो दाँत तोड़ दिए जाना केवल शारीरिक चोट नहीं थी, बल्कि सेन साहब के उस अमानवीय और शोषक अहंकार के 'विष के दाँत' को तोड़ना था।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

सेन साहब के घर में लड़कियों के लिए कड़े नियम थे, उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं, इसकी पूरी ट्रेनिंग दी गई थी। इसके विपरीत, इकलौते बेटे खोखा पर कोई नियम लागू नहीं होता था। वह घर के हर कायदे-कानून का अपवाद था और उसे पूरी आज़ादी थी।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

इस विवाद के माध्यम से लेखक समाज के शोषक वर्ग (अमीरों) और शोषित वर्ग (गरीबों) के बीच के तनाव को दिखाना चाहते हैं। ड्राइवर अपनी अमीरी की धौंस में एक छोटे बच्चे को ढकेल देता है और सेन साहब भी अपने कर्मचारी की वफ़ादारी कुचलकर उसे ही दोषी ठहराते हैं।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

खोखा जब घर की चीजों को तोड़ता-फोड़ता था या गाड़ी की हेडलाइट के शीशे और टायर की हवा निकाल देता था, तो सेन साहब को लगता था कि वह कल-पुर्जों की जांच कर रहा है। इसी शरारत और विनाशकारी व्यवहार को सेन साहब उसके 'इंजीनियर' बनने का लक्षण मानते थे।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

मदन एक अत्यंत निर्भीक, निडर और स्वाभिमानी लड़का है। वह किसी भी अन्याय या अत्याचार के सामने झुकना नहीं जानता। चाहे सेन साहब का ड्राइवर हो या उनका लाडला बेटा खोखा, मदन अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए उनसे डटकर मुकाबला करता है।

भाग ४: शब्दार्थ (कठिन शब्दों के अर्थ)

सोफ़र मोटरकार का ड्राइवर या चालक।
कौतूहल जानने की तीव्र इच्छा, उत्सुकता।
अपवाद जो सामान्य नियमों से बिल्कुल अलग हो।
किरानी ऑफिस या फैक्ट्री का मामूली क्लर्क।
अंतर्विरोध भीतरी टकराव या आपसी मतभेद।
मृत्युपर्यन्त जीवन के अंत समय या मौत तक।
तमीज़ सदाचार, शिष्टाचार या अच्छा व्यवहार।
विष ज़हर (यहाँ अमीरी के घमंड को कहा गया है)।