भाग २: मुख्य पाठ (कहानी का एक-एक शब्द)
सेन साहब की नई मोटरकार बंगले के सामने चमचमाती हुई खड़ी थी। साढ़े सात हज़ार में आई थी। काला रंग था और ऐसी चमक कि उसमें मुँह देख लो। मजाल है कि एक धब्बा भी कहीं लग जाए! क्लीनर और सोफ़र की कड़ी हिदायत थी कि गाड़ी पर कोई उंगली न रखने पाए। सेन साहब को इस गाड़ी पर बड़ा नाज़ था और उससे भी ज्यादा नाज़ था अपने इकलौते बेटे 'खोखा' (कासू) पर। सेन साहब की पांच लड़कियाँ थीं—सीमा, रजनी, आलो, शेफ़ाली और आरती। पाँचों लड़कियाँ तमीज़ और शिष्टता की जीती-जागती मूरत थीं। उनके लिए घर में अलग नियम थे कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं, लेकिन खोखा के लिए घर के नियम कानून बिल्कुल अलग थे, क्योंकि वह तब पैदा हुआ था जब संतान की कोई उम्मीद बाकी नहीं रह गई थी। वह सेन साहब के जीवन का अपवाद था, इसलिए घर के नियमों का भी अपवाद था।
सेन साहब खोखा को एक 'इंजीनियर' बनाना चाहते थे। उनके अनुसार खोखा में अभी से ही इंजीनियर के लक्षण दिखने लगे थे। जब वह घर की किसी चीज़ या गाड़ी के कल-पुर्जों को तोड़ता, तो सेन साहब गुस्सा होने के बजाय खुश होते और अपने दोस्तों से कहते, "देखिए, वह अभी से देखना चाहता है कि इसके अंदर क्या है!" एक दिन सेन साहब के कुछ दोस्त और पत्रकार महोदय उनके बैठकखाने में बैठे थे। बातचीत के दौरान जब बच्चों की शिक्षा की बात चली, तो सेन साहब ने बड़े गर्व से कहा कि वे तो अपने बेटे को इंजीनियर या बिजनेसमैन ही बनाएंगे और इसके लिए उन्होंने अभी से घर पर कारपेंटर (बढ़ई) को बुलाकर उसे थोड़े-थोड़े कल-पुर्जों को ठोकना-पीटना सिखाने का इंतजाम कर दिया है। जब पत्रकार महोदय से उनके बच्चे के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "मैं चाहता हूँ कि मेरा बेटा सबसे पहले एक भद्र और नेक इंसान बने, बाकी वह जो चाहे बन सकता है।" सेन साहब को यह बात थोड़ी चुभ गई।
तभी बाहर अहाते में एक बड़ा हंगामा खड़ा हो गया। सेन साहब का नौकर गिरधरलाल, जो उनकी फैक्ट्री में मामूली किरानी था, अपने पांच-छह साल के बेटे मदन को डांट रहा था। हुआ यह था कि मदन कौतूहलवश सेन साहब की नई चमचमाती गाड़ी को छूने की कोशिश कर रहा था, तभी सोफ़र (ड्राइवर) ने उसे जोर से झिड़क दिया और ढकेल दिया, जिससे मदन को घुटने में चोट लग गई। मदन की माँ ड्राइवर से उलझ पड़ी। जब सेन साहब बाहर आए, तो उन्होंने मदन की माँ को कड़ी डांट पिलाई और गिरधरलाल को बुलाकर कहा, "गिरधर, अपने बेटे को संभालो। ऐसे ही लड़के आगे चलकर गुंडे, चोर और डाकू बनते हैं।" स्वाभिमानी गिरधरलाल अपना सा मुँह लेकर रह गया और रात को उसने घर जाकर मदन की खूब पिटाई की, जिसकी आवाज़ सेन साहब के बंगले तक आ रही थी।
"यह लड़ाई महल और झोपड़ी की लड़ाई थी। इसमें महल वालों ने झोपड़ी वाले पर अपनी ताकत का रोब जमाया। लेखक ने अमीर बाप के बिगड़े हुए लाडले खोखा को 'बंगले का पिल्लू' और गरीब लेकिन स्वाभिमानी मदन को 'गली का आवारा कुत्ता' कहकर समाज के इस गहरे आर्थिक अंतर और झूठे अहंकार पर बहुत ही करारा तंज कसा है।"
इसके कुछ दिनों बाद, एक शाम मदन गली में पड़ोस के आवारा लड़कों के साथ लट्टू नचा रहा था। तभी वहाँ सेन साहब का लाडला खोखा (कासू) रौब जमाते हुए आ पहुँचा और मदन से बोला, "हमको भी लट्टू दो, हम भी खेलेंगे।" मदन के दिल में उस दिन की बेइज्जती की आग अभी बुझी नहीं थी। उसने साफ मना कर दिया, "भाग यहाँ से, बड़ा आया लट्टू खेलने वाला! जा अपने पापा की गाड़ी पर बैठ।" खोखा को घर में कभी 'ना' सुनने की आदत नहीं थी, उसे बड़ा गुस्सा आया। उसने मदन को एक घूंसा जड़ दिया। मदन भी कहाँ पीछे हटने वाला था, उसने आव देखा न ताव, खोखा पर झपट पड़ा। गली के बीच दोनों बच्चों में कड़क दंगल शुरू हो गया। झोपड़ी के लड़के ने महल के लाडले की ऐसी धुनाई की कि खोखा के दो-दो आगे के दाँत टूट गए। खोखा रोता हुआ अपने बंगले की तरफ भागा।
रात को मदन बहुत डरा हुआ था। उसे लग रहा था कि आज जब उसके पिता गिरधरलाल को पता चलेगा कि उसने सेन साहब के बेटे के दाँत तोड़ दिए हैं, तो उसकी खाल ही उधेड़ दी जाएगी। वह डरते-डरते रात के सन्नाटे में रसोई के रास्ते घर के अंदर घुसने लगा, तभी उसका पैर एक बर्तन से टकरा गया और ज़ोर की आवाज़ हुई। गिरधरलाल बत्ती जलाकर बाहर आया। मदन सहम गया और अपनी आँखें बंद कर लीं कि अब मार पड़ने वाली है। लेकिन गिरधरलाल ने मदन को पीटने के बजाय दौड़कर उसे अपनी गोद में उठा लिया और खुशी से चिल्ला उठा, "वाह बेटे! तूने तो कमाल कर दिया। जो काम मैं जिंदगी भर नहीं कर सका, वह तूने एक पल में कर दिया। तूने सेन साहब के अमीर अहंकार के विष के दाँत ही तोड़ डाले!" उस रात गिरधरलाल के झोपड़े से मार की नहीं, बल्कि एक गर्व और आज़ादी की हँसी गूँज रही थी।