Manjit Sawasi
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बिहार बोर्ड कक्षा 10वीं हिंदी | गोधूलि भाग 2

अध्याय ३: भारत से हम क्या सीखें

लेखक: महामहिम मैक्समूलर
प्रामाणिक डिजिटल संस्करण

भाग १: लेखक परिचय

जन्म तिथि छह दिसंबर अट्ठारह सौ तेईस (6 दिसंबर 1823 ई०)
जन्म स्थान डेसाऊ, जर्मनी
विशेष उपाधि 'वेदांतियों का भी वेदांती' (स्वामी विवेकानंद द्वारा)
निधन (मृत्यु) अठारह अक्टूबर उन्नीस सौ (28 अक्टूबर 1900 ई०)

विश्वविख्यात विद्वान एफ० मैक्समूलर का जन्म छह दिसंबर अट्ठारह सौ तेईस (1823 ई०) में जर्मनी के डेसाऊ नामक नगर में हुआ था। जब मैक्समूलर केवल चार वर्ष के थे, तब उनके पिता विल्हेल्म मूलर का निधन हो गया। पिता के साए के बिना भी उनकी शिक्षा-दीक्षा में कोई कमी नहीं आई। वे बचपन से ही संगीत के अतिरिक्त ग्रीक और लैटिन भाषा में निपुण हो गए थे और लैटिन में कविताएँ भी लिखने लगे थे। अट्ठारह वर्ष की उम्र में उन्होंने लिपज़िग विश्वविद्यालय से संस्कृत का गहन अध्ययन शुरू किया।

उन्होंने 'हितोपदेश' का जर्मन भाषा में अनुवाद किया, तथा 'कठ' और 'केन' जैसे उपनिषदों का भी जर्मन में रूपांतरण किया। मैक्समूलर भारत की प्राचीन संस्कृति, सभ्यता और संस्कृत भाषा के ऐसे दीवाने थे कि स्वामी विवेकानंद ने उन्हें 'वेदांतियों का भी वेदांती' कहा था। ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया ने अट्ठारह सौ अड़सठ (1868 ई०) में उन्हें ओसबर्न हाउस में भारतीय संस्कृति पर व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया था, जिससे प्रभावित होकर उन्हें 'नाइट' की उपाधि दी गई थी, जिसे मैक्समूलर ने बहुत छोटी समझकर अस्वीकार कर दिया था।

प्रस्तुत पाठ 'भारत से हम क्या सीखें' वास्तव में एक भाषण है, जो उन्होंने अट्ठारह सौ बयासी (1882 ई०) में इंग्लैंड से भारत आने वाले नए आई० सी० एस० (सिविल सेवा) के युवा अंग्रेज अधिकारियों के स्वागत में दिया था। इसका हिंदी रूपांतरण डॉ० भवानी शंकर त्रिवेदी ने किया है। अठारह अक्टूबर उन्नीस सौ (1900 ई०) को इस महान भारत-प्रेमी मनीषी का देहांत हो गया।

इस भाषण में मैक्समूलर ने भारत के प्राचीन गौरव, उसकी आध्यात्मिक शक्ति, प्राकृतिक सुंदरता और ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में हमारी महानता का ऐसा सजीव वर्णन किया है कि इसे पढ़कर हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। यह पाठ बिहार बोर्ड के छात्रों के लिए भारत को एक नए नज़रिए से समझने का बहुत ही कड़क और अद्भुत माध्यम है।

प्रो० एफ० मैक्समूलर
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भाग २: मुख्य पाठ (भाषण का एक-एक शब्द)

सर्वविध संपदा और प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण कौन-सा देश है, यदि मुझसे कोई पूछे तो मैं उंगली भारत की तरफ ही उठाऊँगा। भारत वह देश है जहाँ मानव-मस्तिष्क की उत्कृष्टतम उपलब्धियों का सबसे पहली बार साक्षात्कार हुआ है, जहाँ जीवन की सबसे बड़ी समस्याओं पर विचार करके ऐसे समाधान ढूँढे गए हैं जो यूरोप के विचारकों के लिए भी अध्ययन का विषय हैं। यदि आप भूविज्ञान में रुचि रखते हैं, यदि आप वनस्पति जगत में खो जाना चाहते हैं, या यदि आप जीवों के विकास का अध्ययन करना चाहते हैं, तो भारत आपके लिए एक ऐसी खुली प्रयोगशाला है जहाँ कदम-कदम पर आपको नई जानकारियाँ मिलेंगी।

जर्मनी के महान विद्वान मैक्समूलर नए अंग्रेज अधिकारियों को संबोधित करते हुए कहते हैं कि यदि आप लोगों को 'सच्चे भारत' के दर्शन करने हैं, तो आपको कलकत्ता, बंबई या मद्रास जैसे बड़े शहरों की चकाचौंध को छोड़कर भारत के गाँवों की तरफ रुख करना होगा। असली भारतीय आत्मा, उसका सच्चा व्यवहार, उसकी सरलता और उसकी प्राचीन संस्कृति आज भी भारत के गाँवों में ही सुरक्षित है। शहरों में तो केवल यूरोप की नकली नकल दिखाई देती है, लेकिन असली भारत की धड़कन उसके ग्रामीण अंचलों में ही बसती है।

💡 लेखक का संदेश (गाँवों की महानता)

"मैक्समूलर का मानना था कि भारत के इतिहास और उसकी आत्मा को समझने के लिए शहरों के दफ्तर नहीं, बल्कि गाँवों की चौपालें देखनी होंगी। हमारा इतिहास, धर्म, और भाईचारा आज भी भारत के गाँवों में उसी पवित्र रूप में जिंदा है जैसा हजारों साल पहले था।"

मैक्समूलर इतिहास का एक बहुत ही शानदार उदाहरण देते हुए कहते हैं कि जब वारेन हेस्टिंग्स भारत का गवर्नर जनरल था, तो उसे वाराणसी (बनारस) के पास एक घड़े में भरे हुए 'दारिस' नाम के एक सौ बहत्तर (172) सोने के प्राचीन सिक्के मिले थे। वारेन हेस्टिंग्स ने सोचा कि ईस्ट इंडिया कंपनी के मालिक इस अनमोल ऐतिहासिक खजाने को देखकर बहुत खुश होंगे और उसकी तारीफ करेंगे, इसलिए उसने वह घड़ा लंदन भेज दिया। लेकिन कंपनी के निदेशकों ने उन सिक्कों के ऐतिहासिक महत्व को समझे बिना, उन्हें साधारण सोना समझकर गला दिया। जब वारेन हेस्टिंग्स वापस इंग्लैंड लौटा तो उसे इस बात का गहरा अफसोस हुआ। मैक्समूलर अंग्रेजों को चेतावनी देते हुए कहते हैं कि भारत आकर ऐसी नादानी मत दोहराना, यहाँ का एक-एक पत्थर और पुरानी लिपियाँ इतिहास का अनमोल खजाना हैं।

भारत की संस्कृत भाषा की तारीफ करते हुए लेखक कहते हैं कि संस्कृत दुनिया की सबसे पुरानी और वैज्ञानिक भाषा है। ग्रीक, लैटिन और जर्मन भाषाओं की जड़ें भी संस्कृत से ही जुड़ी हुई हैं। चाहे कानून की बात हो, धर्म की बात हो या दर्शन की—यदि आपको मानव सभ्यता के उद्गम को समझना है, तो आपको संस्कृत का अध्ययन करना ही पड़ेगा। भारत ने पूरे विश्व को पंचतंत्र की कहानियों के माध्यम से नीतिशास्त्र सिखाया। अंत में लेखक कहते हैं कि जो युवा अधिकारी भारत जा रहे हैं, उन्हें निराश होने की बिल्कुल जरूरत नहीं है, क्योंकि सर विलियम जोन्स की तरह उनके लिए भी भारत में सीखने और खोजने के लिए असीमित अवसर मौजूद हैं।

भाग ३: पाठ के अंत के प्रश्न-उत्तर (Bihar Board Exam Exercises)

💡 प्रत्येक प्रश्न के नीचे दिए गए बटन पर क्लिक करके बिहार बोर्ड परीक्षा मानक के अनुकूल उत्तर प्राप्त करें और उनका निरंतर अभ्यास करें।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

लेखक की दृष्टि में सच्चे भारत के दर्शन भारत के गाँवों में हो सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि भारत की असली संस्कृति, सरलता, प्रेम और प्राचीन परंपराएँ आज भी ग्रामीण अंचलों में ही जीवित हैं, जबकि बड़े शहरों में केवल यूरोपीय सभ्यता की बनावटी चकाचौंध है।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

'दारिस' सोने के प्राचीन ऐतिहासिक सिक्के को कहा जाता है। वारेन हेस्टिंग्स को वाराणसी के पास ऐसे 172 सोने के सिक्के मिले थे। उसने इन्हें ईस्ट इंडिया कंपनी के मालिकों के पास लंदन भेज दिया, लेकिन मालिकों ने बिना सोचे-समझे उन अनमोल सिक्कों को साधारण सोना मानकर पिघला दिया, जिससे एक महान ऐतिहासिक धरोहर नष्ट हो गई।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

लेखक ने बताया कि संस्कृत दुनिया की सबसे पुरानी, समृद्ध और वैज्ञानिक भाषा है। ग्रीक और लैटिन जैसी प्राचीन भाषाओं की उत्पत्ति भी कहीं न कहीं संस्कृत से ही जुड़ी है। मानव सभ्यता के सच्चे इतिहास और चिंतन को समझने के लिए संस्कृत का अध्ययन अनिवार्य है।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

मैक्समूलर विदेशी (जर्मन) होते हुए भी भारत के उपनिषदों, वेदों और दर्शनशास्त्र के बहुत बड़े ज्ञाता थे। उन्होंने 'हितोपदेश' और उपनिषदों का जर्मन में गहरे आदर के साथ अनुवाद किया। भारतीय संस्कृति के प्रति उनके इसी अगाध प्रेम और ज्ञान को देखकर विवेकानंद ने उन्हें यह महान उपाधि दी थी।

भाग ४: शब्दार्थ (कठिन शब्दों के अर्थ)

सर्वविध सब प्रकार से, हर तरह की।
मनीषी महापंडित, बहुत बड़ा विद्वान या चिंतक।
दारिस प्राचीन समय के सोने के सिक्के।
अवगाहन गहराई से समझना या उसमें डूब जाना।
उद्गम शुरुआत या उत्पत्ति का स्थान।
नीतिशास्त्र नैतिक आचरण और सही गलत सिखाने वाला शास्त्र।