भाग २: मुख्य पाठ (निबंध का एक-एक शब्द)
बच्चे कभी-कभी चक्कर में डाल देने वाले प्रश्न कर बैठते हैं। अल्पज्ञ पिता बड़ा दयनीय जीव होता है। मेरी छोटी लड़की ने जब उस दिन मुझसे पूछ लिया कि "मनुष्य के नाखून क्यों बढ़ते हैं?" तो मैं कुछ पल के लिए सोच में पड़ गया। हर तीसरे दिन नाखून बढ़ जाते हैं, बच्चे उन्हें काट देते हैं, पर वे निर्लज्ज की तरह फिर चुपचाप उग आते हैं और बाहर निकल आते हैं। आखिर ये इतने बेहया क्यों हैं? कुछ लाख वर्ष पहले जब मनुष्य जंगली था, वनमानुष जैसा था, तब उसे नाखूनों की बहुत जरूरत थी। नाखून ही उसके अस्त्र थे, क्योंकि उस समय उसके पास लोहे या पत्थर के हथियार नहीं थे। अपने विरोधियों से जूझने और अपना बचाव करने के लिए उसे अपने नाखूनों और दाँतों पर ही निर्भर रहना पड़ता था।
परंतु धीरे-धीरे समय बदला। मनुष्य ने पत्थरों के औजार बनाए, फिर हड्डियों के हथियार बनाए और अंत में लोहे और बम-बारूद के महाविनाशकारी अस्त्र तैयार कर लिए। आज का मनुष्य अपने नाखूनों को काट फेंकता है क्योंकि अब उसे इनकी जरूरत नहीं है। लेकिन यह प्रकृति है, जो मनुष्य को हर तीसरे दिन याद दिलाती है कि तुम भले ही कितने भी आधुनिक बन जाओ, तुम्हारे भीतर का 'पशु' अभी पूरी तरह मरा नहीं है। नाखून का बढ़ना मनुष्य के भीतर की उसी प्राचीन पाशविक वृत्ति (पशुता) का प्रतीक है, और नाखूनों को बार-बार काटते रहना मनुष्य की मनुष्यता, सभ्यता और आत्म-संयमी होने की निशानी है।
"द्विवेदी जी कहते हैं कि दूसरों पर हमला करना, क्रोध करना और अस्त्र-शस्त्र बढ़ाना पशु का स्वभाव है। मनुष्य का स्वभाव तो प्रेम, त्याग, करुणा और 'आत्म-बंधन' (अपने आप पर काबू रखना) में है। नाखून हमारी आदिम हिंसक प्रवृत्ति को दिखाते हैं, जिन्हें काटकर हम अपनी सभ्यता का परिचय देते हैं।"
निबंध में लेखक एक बहुत ही सुंदर भाषाई सत्य को उजागर करते हैं। वे कहते हैं कि विदेशी भाषाओं में जिसे 'इंडिपेंडेंस' (Independence) कहा जाता है, उसका अर्थ होता है 'अधीनता का अभाव' या किसी के अधीन न होना। परंतु भारतीय भाषाओं में इसके लिए 'स्वतंत्रता' या 'स्वराज्य' शब्द का प्रयोग किया जाता है, जिसमें 'स्व' (अपने आप) का बंधन सबसे पहले आता है। यह हमारी संस्कृति की बहुत बड़ी विशेषता है कि हम अपने आप पर खुद का अनुशासन रखना पसंद करते हैं। हम किसी बाहरी ताक़त के दबाव में नहीं, बल्कि अपनी भीतरी करुणा और संस्कारों के कारण बंधे रहते हैं।
आज दुनिया में चारों तरफ एटम बम और हथियारों की होड़ मची हुई है। लोग बाहरी साधनों को बढ़ाकर सुख ढूंढ रहे हैं, लेकिन हमारे देश के एक बूढ़े (महात्मा गाँधी) ने कहा था कि सुख बाहर नहीं, भीतर है। हिंसा को छोड़ो, प्रेम को अपनाओ, दूसरों के सुख-दुख को अपना समझो। लोगों ने उस बूढ़े की बात नहीं मानी और उसे गोली मार दी। पर सत्य तो सत्य ही रहता है। नाखून आज भी बढ़ रहे हैं और आगे भी बढ़ते रहेंगे। कंबख्त नाखून बढ़ते हैं तो बढ़ें, मनुष्य उन्हें कभी स्वीकार नहीं करेगा। मनुष्य अपनी भीतरी हिंसक पशुता को हर दिन काटेगा और एक दिन प्रेम और अहिंसा की जीत अवश्य होगी।