Manjit Sawasi
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बिहार बोर्ड कक्षा 10वीं हिंदी | गोधूलि भाग 2

अध्याय ४: नाखून क्यों बढ़ते हैं

लेखक: आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी
प्रामाणिक डिजिटल संस्करण

भाग १: लेखक परिचय

जन्म तिथि उन्नीस सौ सात (1907 ई०)
जन्म स्थान आरत दुबे का छपरा, बलिया, उत्तर प्रदेश
सर्वोच्च सम्मान पद्मभूषण (भारत सरकार) एवं आलोक पर्व पर साहित्य अकादमी
निधन (मृत्यु) मई उन्नीस सौ उन्यासी (19 मई 1979 ई०), दिल्ली

आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म सन् उन्नीस सौ सात (1907 ई०) में गाँव आरत दुबे का छपरा, बलिया (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। द्विवेदी जी का साहित्य-कर्म भारतवर्ष के सांस्कृतिक इतिहास की रचनात्मक परिणति है। वे केवल एक निबंधकार या आलोचक नहीं थे, बल्कि वे संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, बांग्ला आदि भाषाओं के अगाध पंडित थे। उनकी उच्च शिक्षा काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हुई, जहाँ उन्हें 'ज्योतिषाचार्य' की उपाधि मिली। इसके बाद वे शांतिनिकेतन, काशी हिंदू विश्वविद्यालय और पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ में हिंदी विभाग के प्रोफेसर और अध्यक्ष पद पर रहे।

द्विवेदी जी की विचार-सरणि अत्यंत व्यापक थी। उन्होंने इतिहास, संस्कृति, दर्शन और आधुनिक साहित्य की समस्याओं को एक सर्वथा नए और मानवीय दृष्टिकोण से परखा। रवींद्रनाथ ठाकुर के सान्निध्य में शांतिनिकेतन में रहकर उनके साहित्यिक व्यक्तित्व में और भी निखार आया। भारत सरकार ने उन्हें 'पद्मभूषण' की उपाधि से सम्मानित किया, और उनकी महान कृति 'आलोक पर्व' पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।

उनकी प्रमुख कृतियों में: अशोक के फूल, कल्पलता, विचार और वितर्क, कुटज, आलोक पर्व जैसे उत्कृष्ट निबंध-संग्रह; बाणभट्ट की आत्मकथा, चारु चंद्रलेख, पुनर्नवा, अनामदास का पोथा जैसे विश्वविख्यात उपन्यास; तथा सूर-साहित्य, कबीर, नाथ संप्रदाय, हिंदी साहित्य की भूमिका जैसे ऐतिहासिक आलोचना ग्रंथ शामिल हैं। 19 मई उन्नीस सौ उन्यासी (1979 ई०) को दिल्ली में उनका देहांत हो गया।

प्रस्तुत ललित निबंध 'नाखून क्यों बढ़ते हैं' द्विवेदी जी की इसी गंभीर और मानवीय चिंतन शैली का एक अद्भुत उदाहरण है। यह निबंध बच्चों के एक साधारण से मासूम सवाल से शुरू होता है, लेकिन धीरे-धीरे यह मानव सभ्यता, संस्कृति और हमारी भीतरी पाशविकता के रहस्यों को परत-दर-परत खोल देता है। यह पाठ बिहार बोर्ड के कक्षा 10वीं के छात्रों को गहरी जीवन दृष्टि और आत्म-संयम की सीख देने में अत्यंत कड़क और मददगार है।

आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी
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भाग २: मुख्य पाठ (निबंध का एक-एक शब्द)

बच्चे कभी-कभी चक्कर में डाल देने वाले प्रश्न कर बैठते हैं। अल्पज्ञ पिता बड़ा दयनीय जीव होता है। मेरी छोटी लड़की ने जब उस दिन मुझसे पूछ लिया कि "मनुष्य के नाखून क्यों बढ़ते हैं?" तो मैं कुछ पल के लिए सोच में पड़ गया। हर तीसरे दिन नाखून बढ़ जाते हैं, बच्चे उन्हें काट देते हैं, पर वे निर्लज्ज की तरह फिर चुपचाप उग आते हैं और बाहर निकल आते हैं। आखिर ये इतने बेहया क्यों हैं? कुछ लाख वर्ष पहले जब मनुष्य जंगली था, वनमानुष जैसा था, तब उसे नाखूनों की बहुत जरूरत थी। नाखून ही उसके अस्त्र थे, क्योंकि उस समय उसके पास लोहे या पत्थर के हथियार नहीं थे। अपने विरोधियों से जूझने और अपना बचाव करने के लिए उसे अपने नाखूनों और दाँतों पर ही निर्भर रहना पड़ता था।

परंतु धीरे-धीरे समय बदला। मनुष्य ने पत्थरों के औजार बनाए, फिर हड्डियों के हथियार बनाए और अंत में लोहे और बम-बारूद के महाविनाशकारी अस्त्र तैयार कर लिए। आज का मनुष्य अपने नाखूनों को काट फेंकता है क्योंकि अब उसे इनकी जरूरत नहीं है। लेकिन यह प्रकृति है, जो मनुष्य को हर तीसरे दिन याद दिलाती है कि तुम भले ही कितने भी आधुनिक बन जाओ, तुम्हारे भीतर का 'पशु' अभी पूरी तरह मरा नहीं है। नाखून का बढ़ना मनुष्य के भीतर की उसी प्राचीन पाशविक वृत्ति (पशुता) का प्रतीक है, और नाखूनों को बार-बार काटते रहना मनुष्य की मनुष्यता, सभ्यता और आत्म-संयमी होने की निशानी है।

💡 लेखक का संदेश (आत्म-बंधन की महत्ता)

"द्विवेदी जी कहते हैं कि दूसरों पर हमला करना, क्रोध करना और अस्त्र-शस्त्र बढ़ाना पशु का स्वभाव है। मनुष्य का स्वभाव तो प्रेम, त्याग, करुणा और 'आत्म-बंधन' (अपने आप पर काबू रखना) में है। नाखून हमारी आदिम हिंसक प्रवृत्ति को दिखाते हैं, जिन्हें काटकर हम अपनी सभ्यता का परिचय देते हैं।"

निबंध में लेखक एक बहुत ही सुंदर भाषाई सत्य को उजागर करते हैं। वे कहते हैं कि विदेशी भाषाओं में जिसे 'इंडिपेंडेंस' (Independence) कहा जाता है, उसका अर्थ होता है 'अधीनता का अभाव' या किसी के अधीन न होना। परंतु भारतीय भाषाओं में इसके लिए 'स्वतंत्रता' या 'स्वराज्य' शब्द का प्रयोग किया जाता है, जिसमें 'स्व' (अपने आप) का बंधन सबसे पहले आता है। यह हमारी संस्कृति की बहुत बड़ी विशेषता है कि हम अपने आप पर खुद का अनुशासन रखना पसंद करते हैं। हम किसी बाहरी ताक़त के दबाव में नहीं, बल्कि अपनी भीतरी करुणा और संस्कारों के कारण बंधे रहते हैं।

आज दुनिया में चारों तरफ एटम बम और हथियारों की होड़ मची हुई है। लोग बाहरी साधनों को बढ़ाकर सुख ढूंढ रहे हैं, लेकिन हमारे देश के एक बूढ़े (महात्मा गाँधी) ने कहा था कि सुख बाहर नहीं, भीतर है। हिंसा को छोड़ो, प्रेम को अपनाओ, दूसरों के सुख-दुख को अपना समझो। लोगों ने उस बूढ़े की बात नहीं मानी और उसे गोली मार दी। पर सत्य तो सत्य ही रहता है। नाखून आज भी बढ़ रहे हैं और आगे भी बढ़ते रहेंगे। कंबख्त नाखून बढ़ते हैं तो बढ़ें, मनुष्य उन्हें कभी स्वीकार नहीं करेगा। मनुष्य अपनी भीतरी हिंसक पशुता को हर दिन काटेगा और एक दिन प्रेम और अहिंसा की जीत अवश्य होगी।

भाग ३: पाठ के अंत के प्रश्न-उत्तर (Bihar Board Exam Exercises)

💡 प्रत्येक प्रश्न के नीचे दिए गए बटन पर क्लिक करके बिहार बोर्ड परीक्षा मानक के अनुकूल उत्तर प्राप्त करें और उनका निरंतर अभ्यास करें।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

यह प्रश्न लेखक के सामने तब उपस्थित हुआ जब उनकी छोटी बेटी ने उनसे एक दिन मासूमियत से पूछ लिया कि "मनुष्य के नाखून क्यों बढ़ते हैं?" इस साधारण से सवाल ने लेखक को मानव इतिहास और संस्कृति पर गहरा चिंतन करने के लिए मजबूर कर दिया।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

बढ़ते नाखूनों के माध्यम से अंधी प्रकृति मनुष्य को याद दिलाती है कि तुम भले ही कितने भी आधुनिक बन जाओ और एटम बम बना लो, लेकिन तुम्हारे भीतर की आदिम पाशविक वृत्ति (पशुता) आज भी वैसी ही मौजूद है जैसी लाखों वर्ष पहले वनमानुष के समय थी।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

लेखक ने नाखूनों को निर्लज्ज अपराधी इसलिए कहा है क्योंकि मनुष्य इन्हें हर तीसरे दिन काट कर फेंक देता है, लेकिन ये तनिक भी शर्म महसूस किए बिना चुपचाप फिर से बढ़ आते हैं और पुराने हिंसक रूप में बाहर निकल आते हैं।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

लेखक के अनुसार, अंग्रेजी शब्द 'इंडिपेंडेंस' का अर्थ केवल किसी बाहरी गुलामी का न होना (अधीनता का अभाव) है। परंतु हमारे देश का 'स्वतंत्रता' शब्द 'स्व' यानी स्वयं के बंधन और भीतरी नैतिक अनुशासन को दिखाता है, जो हमारी महान सांस्कृतिक सोच का प्रतीक है।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

सच्ची मनुष्यता अस्त्र-शस्त्र बढ़ाना या हिंसक होना नहीं है। दूसरों के प्रति प्रेम, सहानुभूति, त्याग और अपने ऊपर खुद का नियंत्रण (आत्म-बंधन) रखना ही सच्ची मनुष्यता है। पशुता को काटकर खुद को संस्कारों में बांधना ही मानव का सच्चा धर्म है।

भाग ४: शब्दार्थ (कठिन शब्दों के अर्थ)

अल्पज्ञ कम जानने वाला, थोड़ा ज्ञान रखने वाला व्यक्ति।
पाशविक वृत्ति पशु जैसा हिंसक स्वभाव, जंगलीपन।
निर्लज्ज बिना शर्म का, बेहया या ढीट।
परिणति अंतिम नतीजा, परिणाम या झुकाव।
आत्म-बंधन अपने ऊपर स्वयं का नियंत्रण या अनुशासन।
अबाध बिना किसी रोक-टोक या रुकावट के।
ललित निबंध सुंदर, कोमल और कलात्मक शैली में लिखा गया लेख।
विवशता लाचारी या मजबूरी की स्थिति।