भाग २: मुख्य पाठ (निबंध का एक-एक शब्द)
जिस लिपि में यह पुस्तक छपी है, उसे 'नागरी' या 'देवनागरी' लिपि कहते हैं। हमारी अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी, उसकी विभिन्न बोलियाँ (जैसे मैथिली, भोजपुरी, बुंदेलखण्डी), इसके अलावा संस्कृत, प्राकृत और मराठी भाषाएँ भी इसी देवनागरी लिपि में लिखी जाती हैं। यहाँ तक कि नेपाली और नेवारी भाषाएँ भी इसी लिपि का प्रयोग करती हैं। आज से लगभग दो सौ वर्ष पहले इस लिपि के टाइप बने और इसमें पुस्तकें छपने लगीं, जिसके कारण इसके अक्षरों में स्थिरता आ गई और आज यह पूरे भारत की एक मुख्य पहचान बन चुकी है।
लेखक इतिहास की परतों को खोलते हुए बताते हैं कि आज से लगभग एक हजार वर्ष पहले देवनागरी लिपि पूरे देश में एक 'सार्वदेशिक लिपि' बन चुकी थी। देश के कोने-कोने से मिलने वाले प्राचीन शिलालेख, ताम्रपत्र और राजाओं के सिक्के इस बात का पक्का प्रमाण हैं। दक्षिण भारत में इस लिपि को 'नंदिनागरी' कहा जाता था। वहाँ के राष्ट्रकूट राजाओं, चोल राजाओं और विजयनगर के शासकों (जैसे हरिहर, बुक्का, कृष्णदेवराय) के सिक्कों और दानपत्रों पर नागरी लिपि के कड़क अक्षर साफ़-साफ़ उत्कीर्ण मिलते हैं।
"मुले जी कहते हैं कि इस लिपि का नाम 'नागरी' क्यों पड़ा, इसके पीछे कई विद्वानों के अलग-अलग मत हैं। एक मत के अनुसार बाकी सारे शहर केवल 'नगर' थे, पर काशी 'देवनगर' था, इसलिए वहाँ प्रयुक्त लिपि को 'देवनागरी' कहा गया। वहीं दूसरे मत के अनुसार गुजरात के नागर ब्राह्मणों द्वारा सबसे पहले इस्तेमाल किए जाने के कारण इसका नाम नागरी पड़ा।"
उत्तर भारत में नागरी लिपि का इतिहास और भी प्राचीन है। ग्यारहवीं सदी में जब महमूद गजनवी ने भारत पर आक्रमण किया, तो उसके द्वारा चलाए गए चाँदी के सिक्कों पर एक तरफ अरबी और दूसरी तरफ नागरी लिपि में 'अव्ययमेकं मोहम्मद अवतार' साफ़-साफ़ लिखा हुआ था। इसके बाद मोहम्मद गोरी, अलाउद्दीन खिलजी और शेरशाह सूरी जैसे शासकों के सिक्कों पर भी नागरी अक्षरों में उनके नाम खुदे हुए थे। यहाँ तक कि महान मुगल सम्राट अकबर के चलाए गए सिक्कों पर 'राम-सिय' शब्द नागरी लिपि में अंकित था, जो हमारी सांस्कृतिक एकता का एक बहुत बड़ा ऐतिहासिक प्रमाण है।
निबंध के अंत में गुणाकर मुले जी स्पष्ट करते हैं कि नागरी लिपि प्राचीन ब्राह्मी और गुप्त लिपि से विकसित हुई है। समय के साथ-साथ इसके अक्षरों की प्राचीन टेढ़ी-मेढ़ी बनावट आधुनिक कड़क और सीधी लकीरों में बदल गई। आज दक्षिण हो या उत्तर, पूर्व हो या पश्चिम—नागरी लिपि ने पूरे भारतवर्ष को एक मजबूत सांस्कृतिक धागे में पिरोकर रखा है। इसका इतिहास अत्यंत गौरवशाली है और यह केवल अक्षरों का समूह नहीं, बल्कि हमारी गौरवशाली भारतीय सभ्यता की जीती-जागती कहानी है।