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बिहार बोर्ड कक्षा 10वीं हिंदी | गोधूलि भाग 2

अध्याय ५: नागरी लिपि

लेखक: गुणाकर मुले
प्रामाणिक डिजिटल संस्करण

भाग १: लेखक परिचय

जन्म तिथि उन्नीस सौ पैंतीस (1935 ई०)
जन्म स्थान अमरावती, महाराष्ट्र का एक गाँव
मुख्य विशेषता गणित, खगोल विज्ञान और लिपियों के अनन्य शोधकर्ता
निधन (मृत्यु) अक्टूबर दो हजार नौ (16 अक्टूबर 2009 ई०)

गुणाकर मुले का जन्म सन् उन्नीस सौ पैंतीस (1935 ई०) में महाराष्ट्र के अमरावती जिले के एक गाँव में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा ग्रामीण परिवेश में 'मराठी' माध्यम से हुई। बाद में उन्होंने इलाहाबाद आकर वर्धा से मैट्रिक किया और फिर आगे चलकर उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से गणित में एम० ए० की डिग्री हासिल की। गुणाकर मुले जी केवल एक सामान्य इतिहासकार नहीं थे, बल्कि वे विज्ञान, गणित और प्राचीन लिपियों के बहुत बड़े ज्ञाता थे, जिन्होंने हिंदी में विज्ञान-लेखन की नींव मजबूत की थी।

मुले जी ने राहुल सांकृत्यायन के सान्निध्य में रहकर अपनी बहुमुखी प्रतिभा को निखारा। उन्होंने इतिहास और विज्ञान को इतना सरल बनाकर प्रस्तुत किया कि सामान्य पाठक भी उसे सहज समझ सके। उनके द्वारा लिखे गए लेखों में प्राचीन भारत के गौरवमयी इतिहास और हमारी लिपियों के विकास की अत्यंत प्रामाणिक और वैज्ञानिक मीमांसा मिलती है।

उनकी प्रमुख कृतियों में: अक्षर कथा, अक्षरों की कहानी, प्राचीन भारत के महान वैज्ञानिक, सौरमंडल, सूर्य, नक्षत्र लोक, भारतीय लिपियों की कहानी, आकाश दर्शन आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उन्होंने ढाई हजार से अधिक लेख तथा तीस से अधिक उत्कृष्ट पुस्तकें लिखीं। 16 अक्टूबर दो हजार नौ (2009 ई०) में इस महान मनीषी का निधन हो गया।

प्रस्तुत निबंध 'नागरी लिपि' उनकी प्रसिद्ध पुस्तक 'भारतीय लिपियों की कहानी' से लिया गया है। इस निबंध में लेखक ने हमारी अपनी देवनागरी लिपि के इतिहास, उसके नामकरण और उसके अखिल भारतीय विस्तार पर बहुत ही कड़क और वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। यह पाठ बिहार बोर्ड कक्षा 10वीं के छात्रों को अपनी मातृभाषा और राष्ट्रलिपि के प्रति गौरव का अनुभव कराने में अत्यंत सहायक और अनिवार्य है।

प्रो० गुणाकर मुले
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भाग २: मुख्य पाठ (निबंध का एक-एक शब्द)

जिस लिपि में यह पुस्तक छपी है, उसे 'नागरी' या 'देवनागरी' लिपि कहते हैं। हमारी अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी, उसकी विभिन्न बोलियाँ (जैसे मैथिली, भोजपुरी, बुंदेलखण्डी), इसके अलावा संस्कृत, प्राकृत और मराठी भाषाएँ भी इसी देवनागरी लिपि में लिखी जाती हैं। यहाँ तक कि नेपाली और नेवारी भाषाएँ भी इसी लिपि का प्रयोग करती हैं। आज से लगभग दो सौ वर्ष पहले इस लिपि के टाइप बने और इसमें पुस्तकें छपने लगीं, जिसके कारण इसके अक्षरों में स्थिरता आ गई और आज यह पूरे भारत की एक मुख्य पहचान बन चुकी है।

लेखक इतिहास की परतों को खोलते हुए बताते हैं कि आज से लगभग एक हजार वर्ष पहले देवनागरी लिपि पूरे देश में एक 'सार्वदेशिक लिपि' बन चुकी थी। देश के कोने-कोने से मिलने वाले प्राचीन शिलालेख, ताम्रपत्र और राजाओं के सिक्के इस बात का पक्का प्रमाण हैं। दक्षिण भारत में इस लिपि को 'नंदिनागरी' कहा जाता था। वहाँ के राष्ट्रकूट राजाओं, चोल राजाओं और विजयनगर के शासकों (जैसे हरिहर, बुक्का, कृष्णदेवराय) के सिक्कों और दानपत्रों पर नागरी लिपि के कड़क अक्षर साफ़-साफ़ उत्कीर्ण मिलते हैं।

💡 लेखक का शोध (नामकरण की गुत्थी)

"मुले जी कहते हैं कि इस लिपि का नाम 'नागरी' क्यों पड़ा, इसके पीछे कई विद्वानों के अलग-अलग मत हैं। एक मत के अनुसार बाकी सारे शहर केवल 'नगर' थे, पर काशी 'देवनगर' था, इसलिए वहाँ प्रयुक्त लिपि को 'देवनागरी' कहा गया। वहीं दूसरे मत के अनुसार गुजरात के नागर ब्राह्मणों द्वारा सबसे पहले इस्तेमाल किए जाने के कारण इसका नाम नागरी पड़ा।"

उत्तर भारत में नागरी लिपि का इतिहास और भी प्राचीन है। ग्यारहवीं सदी में जब महमूद गजनवी ने भारत पर आक्रमण किया, तो उसके द्वारा चलाए गए चाँदी के सिक्कों पर एक तरफ अरबी और दूसरी तरफ नागरी लिपि में 'अव्ययमेकं मोहम्मद अवतार' साफ़-साफ़ लिखा हुआ था। इसके बाद मोहम्मद गोरी, अलाउद्दीन खिलजी और शेरशाह सूरी जैसे शासकों के सिक्कों पर भी नागरी अक्षरों में उनके नाम खुदे हुए थे। यहाँ तक कि महान मुगल सम्राट अकबर के चलाए गए सिक्कों पर 'राम-सिय' शब्द नागरी लिपि में अंकित था, जो हमारी सांस्कृतिक एकता का एक बहुत बड़ा ऐतिहासिक प्रमाण है।

निबंध के अंत में गुणाकर मुले जी स्पष्ट करते हैं कि नागरी लिपि प्राचीन ब्राह्मी और गुप्त लिपि से विकसित हुई है। समय के साथ-साथ इसके अक्षरों की प्राचीन टेढ़ी-मेढ़ी बनावट आधुनिक कड़क और सीधी लकीरों में बदल गई। आज दक्षिण हो या उत्तर, पूर्व हो या पश्चिम—नागरी लिपि ने पूरे भारतवर्ष को एक मजबूत सांस्कृतिक धागे में पिरोकर रखा है। इसका इतिहास अत्यंत गौरवशाली है और यह केवल अक्षरों का समूह नहीं, बल्कि हमारी गौरवशाली भारतीय सभ्यता की जीती-जागती कहानी है।

भाग ३: पाठ के अंत के प्रश्न-उत्तर (Bihar Board Exam Exercises)

💡 प्रत्येक प्रश्न के नीचे दिए गए बटन पर क्लिक करके बिहार बोर्ड परीक्षा मानक के अनुकूल उत्तर प्राप्त करें और उनका निरंतर अभ्यास करें।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

देवनागरी लिपि के अंतर्गत मुख्य रूप से हिंदी, उसकी विविध बोलियाँ (जैसे मैथिली, भोजपुरी), संस्कृत, प्राकृत, मराठी, नेपाली और नेवारी भाषाएँ लिखी जाती हैं।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

ईसा की आठवीं से ग्यारहवीं सदियों में नागरी लिपि पूरे भारतवर्ष में फैल चुकी थी। उत्तर से लेकर दक्षिण भारत (नंदिनागरी) तक के राजाओं के शिलालेखों, ताम्रपत्रों और सिक्कों पर इसके अक्षर मिलते हैं, इसलिए यह एक सार्वदेशिक लिपि थी।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

आज से लगभग दो सौ वर्ष पहले जब नागरी लिपि के कड़क और साफ़ मेटल टाइप (Type) बने और इसमें बड़े पैमाने पर पुस्तकें तथा अखबार छपने शुरू हुए, तब इसके अक्षरों की बनावट स्थिर हो गई।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

महमूद गजनवी के चाँदी के सिक्कों पर अरबी के साथ नागरी लिपि में कलमा खुदा हुआ था। वहीं सम्राट अकबर के सिक्कों पर 'राम-सिय' शब्द नागरी में अंकित था। यह दर्शाता है कि मुस्लिम शासकों के काल में भी नागरी लिपि का बहुत बड़ा सम्मान और राष्ट्रव्यापी प्रभाव था।

भाग ४: शब्दार्थ (कठिन शब्दों के अर्थ)

सार्वदेशिक जो पूरे देश में फैला हो, राष्ट्रव्यापी।
उत्कीर्ण पत्थर, ताँबे या धातु पर खोदकर लिखा गया अक्षर।
ताम्रपत्र ताँबे का वह पत्तर जिस पर राजाओं के आदेश लिखे जाते थे।
लिपि भाषा को लिखने के लिए तय किए गए चिन्ह या बनावट।
जन्मना जन्म से ही, पैदा होने के समय से।
अनुकरण देखा-देखी नकल करना या पीछे चलना।