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बिहार बोर्ड कक्षा 10वीं हिंदी | गोधूलि भाग 2

अध्याय ६: बहादुर

लेखक: अमरकांत
न्यू स्टैंडअलोन डिजिटल संस्करण

भाग १: लेखक परिचय

जन्म तिथि जुलाई उन्नीस सौ पच्चीस (1 जुलाई 1925 ई०)
जन्म स्थान नागरा, बलिया, उत्तर प्रदेश
सर्वोच्च सम्मान साहित्य अकादमी पुरस्कार एवं ज्ञानपीठ पुरस्कार
निधन (मृत्यु) फरवरी दो हजार चौदह (17 फरवरी 2014 ई०)

स्वाधीनता संग्राम के सिपाही और यथार्थवादी कथाकार अमरकांत का जन्म 1 जुलाई उन्नीस सौ पच्चीस (1925 ई०) में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नागरा नामक गाँव में हुआ था। उन्होंने अपनी इंटरमीडिएट की शिक्षा इलाहाबाद से प्राप्त की और फिर वहीं के क्रिश्चियन कॉलेज से बी० ए० किया। अमरकांत जी नई कहानी आंदोलन के एक प्रमुख स्तंभ थे, जिन्होंने साधारण मध्यमवर्ग और शोषित समाज के लोगों के जीवन की सच्चाइयों को बेहद करीब से देखा और अपनी रचनाओं में ढाला।

अमरकांत की कहानियों में एक खास किस्म की देशज सादगी और गहरा सामाजिक सरोकार मिलता है। वे अपनी सहज भाषा शैली के लिए जाने जाते हैं, जो सीधे पाठकों के दिलों को छू लेती है। उनके साहित्य-योगदान के लिए उन्हें भारत के सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' तथा 'ज्ञानपीठ पुरस्कार' से भी नवाजा गया था।

उनकी प्रमुख रचनाओं में: जिंदगी और जोंक, देश के लोग, मौत का नगर, कुहासा जैसे प्रसिद्ध कहानी-संग्रह; तथा सूखा पत्ता, आकाश पक्षी, काले-उजले दिन, इन दिनों, ग्राम सेविका जैसे बेजोड़ उपन्यास शामिल हैं। 17 फरवरी दो हजार चौदह (2014 ई०) को इलाहाबाद में इस महान कथाशिल्पी का देहावसान हो गया।

प्रस्तुत कहानी 'बहादुर' एक ऐसे नेपाली लड़के की मर्मस्पर्शी दास्तान है, जो अपनी माँ की मार से तंग आकर घर से भाग जाता है और एक मध्यमवर्गीय परिवार में नौकर बन जाता है। इस कहानी के माध्यम से लेखक ने समाज के झूठे दिखावे, मध्यमवर्ग के अहंकार और एक सीधे-साधे गरीब बच्चे के स्वाभिमान को बहुत ही सजीवता से चित्रित किया है। बिहार बोर्ड की परीक्षा के लिए यह पाठ सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील कहानियों में से एक है।

कथाकार अमरकांत
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भाग २: मुख्य पाठ (कहानी का एक-एक शब्द)

वह नेपाली लड़का लगभग बारह-तेरह वर्ष का था। उसका रंग गोरा था, मुँह चपटा था और वह आधी बांह की कमीज, भूरे रंग का पुराना जूता और गले में एक स्काउट जैसा रूमाल बांधे हुए था। उसका पूरा नाम 'दिल बहादुर' था, लेकिन लेखक के घर आने के बाद मालकिन निर्मला ने उसके नाम से 'दिल' शब्द उड़ा दिया और वह सिर्फ 'बहादुर' रह गया। वह अपने घर नेपाल से इसलिए भागा था क्योंकि उसकी माँ बहुत गुस्से वाली थी। एक दिन बहादुर ने अपनी माँ की प्यारी भैंस को बहुत मारा था, जिससे गुस्सा होकर उसकी माँ ने भी बहादुर की दुगनी पिटाई कर दी थी। इसी मार के डर से वह घर से हंडिया से दो रुपये चुराकर भाग गया था और गोरखपुर स्टेशन पर लेखक के साले साहब को मिला था।

शुरुआत में लेखक के घर में बहादुर का बहुत स्वागत हुआ। निर्मला कहती थी कि बहादुर नौकर नहीं, उसके छोटे बेटे जैसा है। बहादुर भी सुबह से रात तक घर का सारा काम हंसते-हंसते करता था—कपड़े धोना, बर्तन मांजना, झाड़ू लगाना और निर्मला के पैरों में मालिश करना। वह रात को सोने से पहले अपनी जेब से एक जोड़ी फटे पुराने ताश के पत्ते, कुछ गोलियाँ और नेपाली टोपी निकालकर खेलता था और मंद स्वर में कोई पहाड़ी गाना गुनगुनाता था। उसकी इस मासूमियत ने पूरे घर को खुशियों से भर दिया था।

💡 लेखक का संदेश (बहादुर का आत्मसम्मान)

"अमरकांत जी ने दिखाया है कि कैसे एक मध्यमवर्गीय परिवार अपनी शान दिखाने के लिए नौकर रखता है, लेकिन धीरे-धीरे उस पर अपनी सारी भड़ास निकालने लगता है। बहादुर जैसा हंसमुख बच्चा जब रोज गालियाँ और मार खाता है, तो उसका भीतरी आत्मसम्मान जाग उठता है। नौकर भी एक इंसान है, उसकी भी भावनाएँ होती हैं, यही इस पाठ का सबसे कड़क संदेश है।"

धीरे-धीरे समय बीता और घर के लोगों का बर्ताव बहादुर के प्रति बदलने लगा। लेखक का बड़ा बेटा किशोर एक बिगड़ैल लड़का था, जो अपने सारे काम बहादुर से करवाता था और जरा सी गलती होने पर उसे गंदी-गंदी गालियाँ देता था और मारता भी था। धीरे-धीरे मालकिन निर्मला भी चिड़चिड़ी हो गई और उसने बहादुर को हाथ से बनी रोटियाँ देना बंद कर दिया और कहा कि वह अपनी रोटी खुद बनाए। बहादुर सुबह से रात तक भूखा-प्यासा रहकर काम करता, लेकिन फिर भी उसे हर बात पर डांट और मार ही मिलती थी। उसके चेहरे की वह पुरानी हँसी अब पूरी तरह गायब हो चुकी थी।

हद तो तब हो गई जब एक इतवार को लेखक के घर कुछ दूर के रिश्तेदार आए। उन रिश्तेदारों ने प्रपंच रचा और आरोप लगाया कि उनके ग्यारह रुपये (11 रु०) जो उन्होंने चारपाई पर रखे थे, गायब हो गए हैं। उन्होंने सीधे बहादुर पर चोरी का इल्जाम लगा दिया। लेखक और निर्मला ने भी रिश्तेदारों की बात पर भरोसा कर लिया। बहादुर को कमरे में ले जाकर बहुत पीटा गया और पूछा गया कि "बता रुपये कहाँ छुपाए हैं?" बहादुर रोता रहा और हाथ जोड़कर कहता रहा, "बाबूजी, मैंने रुपये नहीं लिए।" इस झूठे इल्जाम और मार ने बहादुर के सीधे दिल को पूरी तरह तोड़ दिया।

इसके कुछ दिनों बाद, एक दोपहर जब पूरा घर शांत था, बहादुर चुपचाप अपना सारा सामान, अपनी नेपाली टोपी, अपनी गोलियाँ और यहाँ तक कि अपनी तनख्वाह के पैसे भी वहीं छोड़कर हमेशा के लिए घर से चला गया। जब शाम को लेखक और निर्मला घर लौटे, तो उन्हें पूरा घर सूना मिला। किशोर को भी अपनी गलती का अहसास हुआ। निर्मला रोने लगी कि काश उसने बहादुर पर शक न किया होता। लेखक भी उदास हो गए। बहादुर के जाने के बाद पूरे घर को समझ में आया कि उन्होंने एक नौकर नहीं, बल्कि अपने घर की लक्ष्मी और एक सच्चे, ईमानदार बच्चे को खो दिया है। अब पछताने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं बचा था।

भाग ३: पाठ के अंत के प्रश्न-उत्तर (Bihar Board Exam Exercises)

💡 प्रत्येक प्रश्न के नीचे दिए गए बटन पर क्लिक करके बिहार बोर्ड परीक्षा मानक के अनुकूल उत्तर प्राप्त करें और उनका निरंतर अभ्यास करें।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

बहादुर की माँ बहुत ही गुस्सैल स्वभाव की थी। एक दिन बहादुर ने अपनी माँ की चहेती भैंस को बहुत मारा था, जिससे नाराज़ होकर उसकी माँ ने बहादुर की लाठियों से बेरहमी से पिटाई कर दी। माँ की इसी मार के डर और बेइज्जती के कारण बहादुर घर से दो रुपये चुराकर भाग गया था।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

बहादुर का पूरा नाम 'दिल बहादुर' था। लेखक की पत्नी निर्मला ने नौकरों के नाम को छोटा रखने और उन पर अपना पूरा मालकिना हक जताने की संकीर्ण सोच के तहत उसके नाम से 'दिल' शब्द हटा दिया, ताकि वह सिर्फ काम करने वाला एक साधारण नौकर लगे।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

किशोर लेखक का बड़ा बेटा था जो अत्यंत घमंडी और बिगड़ैल था। वह अपने सारे काम बहादुर से जबरन करवाता था। ज़रा सी भी ऊंच-नीच होने पर वह बहादुर को गंदी-गंदी गालियाँ देता था और उस पर हाथ उठाता था, क्योंकि वह खुद को मालिक और बहादुर को पैर की जूती समझता था।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

लेखक के घर आए कुछ रिश्तेदारों ने अपने 11 रुपये खो जाने का झूठा नाटक रचा और सारा दोष सीधे सीधे सीधे सीधे सीधे सीधे सीधे सीधे सीधे सीधे बहादुर पर मढ़ दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि बहादुर का सच्चा दिल टूट गया, उसे बहुत पीटा गया और अंततः उसने वह घर छोड़ दिया।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

बहादुर के जाने पर सबको पछतावा इसलिए हुआ क्योंकि वह अपना कोई भी सामान या अपनी तनख्वाह के पैसे तक साथ नहीं लेकर गया था। इससे साबित हो गया कि वह पूरी तरह बेकसूर और सच्चा था। घर के लोगों को अपनी क्रूरता और उसकी निस्वार्थ सेवा की याद आने लगी।

भाग ४: शब्दार्थ (कठिन शब्दों के अर्थ)

प्रपंच धोखाधड़ी, झूठा नाटक या साज़िश रचना।
हंडिया मिट्टी का छोटा बर्तन जिसमें पैसे या अनाज रखे जाते हैं।
आकस्मिक अचानक होने वाला, जिसकी कोई उम्मीद न हो।
यथार्थवादी जीवन की असली सच्चाइयों को दिखाने वाला।
सहानुभूति दूसरों के दुख को समझकर उसके प्रति दया का भाव।
तिलांजलि पूरी तरह से त्याग देना या छोड़ देना।