भाग २: मुख्य पाठ (कहानी का एक-एक शब्द)
वह नेपाली लड़का लगभग बारह-तेरह वर्ष का था। उसका रंग गोरा था, मुँह चपटा था और वह आधी बांह की कमीज, भूरे रंग का पुराना जूता और गले में एक स्काउट जैसा रूमाल बांधे हुए था। उसका पूरा नाम 'दिल बहादुर' था, लेकिन लेखक के घर आने के बाद मालकिन निर्मला ने उसके नाम से 'दिल' शब्द उड़ा दिया और वह सिर्फ 'बहादुर' रह गया। वह अपने घर नेपाल से इसलिए भागा था क्योंकि उसकी माँ बहुत गुस्से वाली थी। एक दिन बहादुर ने अपनी माँ की प्यारी भैंस को बहुत मारा था, जिससे गुस्सा होकर उसकी माँ ने भी बहादुर की दुगनी पिटाई कर दी थी। इसी मार के डर से वह घर से हंडिया से दो रुपये चुराकर भाग गया था और गोरखपुर स्टेशन पर लेखक के साले साहब को मिला था।
शुरुआत में लेखक के घर में बहादुर का बहुत स्वागत हुआ। निर्मला कहती थी कि बहादुर नौकर नहीं, उसके छोटे बेटे जैसा है। बहादुर भी सुबह से रात तक घर का सारा काम हंसते-हंसते करता था—कपड़े धोना, बर्तन मांजना, झाड़ू लगाना और निर्मला के पैरों में मालिश करना। वह रात को सोने से पहले अपनी जेब से एक जोड़ी फटे पुराने ताश के पत्ते, कुछ गोलियाँ और नेपाली टोपी निकालकर खेलता था और मंद स्वर में कोई पहाड़ी गाना गुनगुनाता था। उसकी इस मासूमियत ने पूरे घर को खुशियों से भर दिया था।
"अमरकांत जी ने दिखाया है कि कैसे एक मध्यमवर्गीय परिवार अपनी शान दिखाने के लिए नौकर रखता है, लेकिन धीरे-धीरे उस पर अपनी सारी भड़ास निकालने लगता है। बहादुर जैसा हंसमुख बच्चा जब रोज गालियाँ और मार खाता है, तो उसका भीतरी आत्मसम्मान जाग उठता है। नौकर भी एक इंसान है, उसकी भी भावनाएँ होती हैं, यही इस पाठ का सबसे कड़क संदेश है।"
धीरे-धीरे समय बीता और घर के लोगों का बर्ताव बहादुर के प्रति बदलने लगा। लेखक का बड़ा बेटा किशोर एक बिगड़ैल लड़का था, जो अपने सारे काम बहादुर से करवाता था और जरा सी गलती होने पर उसे गंदी-गंदी गालियाँ देता था और मारता भी था। धीरे-धीरे मालकिन निर्मला भी चिड़चिड़ी हो गई और उसने बहादुर को हाथ से बनी रोटियाँ देना बंद कर दिया और कहा कि वह अपनी रोटी खुद बनाए। बहादुर सुबह से रात तक भूखा-प्यासा रहकर काम करता, लेकिन फिर भी उसे हर बात पर डांट और मार ही मिलती थी। उसके चेहरे की वह पुरानी हँसी अब पूरी तरह गायब हो चुकी थी।
हद तो तब हो गई जब एक इतवार को लेखक के घर कुछ दूर के रिश्तेदार आए। उन रिश्तेदारों ने प्रपंच रचा और आरोप लगाया कि उनके ग्यारह रुपये (11 रु०) जो उन्होंने चारपाई पर रखे थे, गायब हो गए हैं। उन्होंने सीधे बहादुर पर चोरी का इल्जाम लगा दिया। लेखक और निर्मला ने भी रिश्तेदारों की बात पर भरोसा कर लिया। बहादुर को कमरे में ले जाकर बहुत पीटा गया और पूछा गया कि "बता रुपये कहाँ छुपाए हैं?" बहादुर रोता रहा और हाथ जोड़कर कहता रहा, "बाबूजी, मैंने रुपये नहीं लिए।" इस झूठे इल्जाम और मार ने बहादुर के सीधे दिल को पूरी तरह तोड़ दिया।
इसके कुछ दिनों बाद, एक दोपहर जब पूरा घर शांत था, बहादुर चुपचाप अपना सारा सामान, अपनी नेपाली टोपी, अपनी गोलियाँ और यहाँ तक कि अपनी तनख्वाह के पैसे भी वहीं छोड़कर हमेशा के लिए घर से चला गया। जब शाम को लेखक और निर्मला घर लौटे, तो उन्हें पूरा घर सूना मिला। किशोर को भी अपनी गलती का अहसास हुआ। निर्मला रोने लगी कि काश उसने बहादुर पर शक न किया होता। लेखक भी उदास हो गए। बहादुर के जाने के बाद पूरे घर को समझ में आया कि उन्होंने एक नौकर नहीं, बल्कि अपने घर की लक्ष्मी और एक सच्चे, ईमानदार बच्चे को खो दिया है। अब पछताने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं बचा था।