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बिहार बोर्ड कक्षा 10वीं हिंदी | गोधूलि भाग 2

अध्याय 07: परंपरा का मूल्यांकन

लेखक: डॉ० रामविलास शर्मा
न्यू स्टैंडअलोन डिजिटल संस्करण

भाग १: लेखक परिचय

जन्म तिथि दस अक्टूबर उन्नीस सौ बारह (10 अक्टूबर 1912 ई०)
जन्म स्थान ऊंचगाँव सानी, उन्नाव, उत्तर प्रदेश
मुख्य पहचान प्रगतिशील आलोचना के शिखर पुरुष और प्रख्यात भाषाविद्
निधन (मृत्यु) तीस मई दो हजार (30 मई 2000 ई०), दिल्ली

हिंदी के प्रख्यात आलोचक, भाषाविद् और विचारक डॉ० रामविलास शर्मा का जन्म 10 अक्टूबर उन्नीस सौ बारह (1912 ई०) में उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के ऊंचगाँव सानी नामक स्थान पर हुआ था। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम० ए० किया और फिर वहीं से पी-एच० डी० की उपाधि प्राप्त की। डॉ० शर्मा जी ने अपने करियर की शुरुआत लखनऊ विश्वविद्यालय में अंग्रेजी विभाग के प्राध्यापक के रूप में की थी, और बाद में वे आगरा के बलवंत राजपूत कॉलेज में अंग्रेजी विभाग के अध्यक्ष रहे।

रामविलास शर्मा जी मार्क्सवादी चेतना के एक अत्यंत कड़क और प्रखर आलोचक थे, जिन्होंने हिंदी साहित्य की परंपराओं का बहुत ही वैज्ञानिक और ऐतिहासिक मूल्यांकन किया। उन्होंने साहित्य की जड़ों को भारतीय समाज के आम गरीब मजदूरों और किसानों की संस्कृति से जोड़कर देखा। वे भारतीय इतिहास, भाषा विज्ञान और राजनीति के भी असाधारण पंडित थे। उनके इस विराट साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें 'साहित्य अकादमी पुरस्कार', 'व्यास सम्मान' तथा 'शलाका सम्मान' जैसे गरिमामयी पुरस्कारों से नवाजा गया था।

उनकी प्रसिद्ध कृतियों में: भारतेंदु हरिश्चंद्र, प्रेमचंद और उनका युग, निराला की साहित्य साधना (तीन खंडों में), भाषा और समाज, भारत की भाषा समस्या, भारत के प्राचीन भाषा परिवार और हिंदी आदि कालजयी ग्रंथ शामिल हैं। 30 मई दो हजार (2000 ई०) को दिल्ली में इस महान यशस्वी मनीषी का देहावसान हो गया।

प्रस्तुत निबंध 'परंपरा का मूल्यांकन' उनकी विख्यात पुस्तक 'परंपरा का मूल्यांकन' से ही संकलित है। इस निबंध में लेखक ने स्पष्ट किया है कि जो लोग समाज में बुनियादी बदलाव लाना चाहते हैं, उन्हें साहित्य की महान परंपराओं को गहराई से समझना होगा। लेखक ने पूंजीवाद, समाजवाद और हमारी सांस्कृतिक धरोहरों का बहुत ही तार्किक और वैज्ञानिक विश्लेषण किया है। बिहार बोर्ड परीक्षा की तैयारी करने वाले कक्षा 10वीं के छात्रों के लिए यह निबंध वैचारिक सोच और बौद्धिक क्षमता बढ़ाने में बहुत कड़क और उपयोगी है।

डॉ० रामविलास शर्मा
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भाग २: मुख्य पाठ (निबंध का एक-एक शब्द)

जो लोग साहित्य में युग-परिवर्तन करना चाहते हैं, जो लकीर के फ़कीर नहीं हैं और जो क्रांतिकारी साहित्य रचना चाहते हैं, उनके लिए साहित्य की परंपरा का ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है। जो लोग समाज में बुनियादी बदलाव लाकर समाजवादी व्यवस्था कायम करना चाहते हैं, वे अतीत की महान सांस्कृतिक परंपराओं को छोड़े बिना ही आगे बढ़ सकते हैं। क्योंकि साहित्य की परंपरा का मूल्यांकन करते हुए हम सबसे पहले उस साहित्य का मूल्य निर्धारित करते हैं जो शोषक वर्गों के खिलाफ शोषित जनता के हितों को आवाज देता है।

लेखक स्पष्ट करते हैं कि साहित्य की धारा कभी भी सामाजिक परिस्थितियों से पूरी तरह कटकर अलग नहीं बह सकती। यद्यपि साहित्य सामाजिक आर्थिक परिस्थितियों से प्रभावित होता है, फिर भी इसकी अपनी एक 'सापेक्ष स्वाधीनता' होती है। इतिहास गवाह है कि गुलाम अमरीका ने एथेंस की सभ्यता को आर्थिक रूप से गुलाम बना लिया था, लेकिन एथेंस की कला और साहित्य की महानता के सामने वह खुद हमेशा बौना ही रहा। एथेंस की गुलामी के बाद भी वहाँ का साहित्य अमर रहा, जिससे पता चलता है कि भौतिक परिस्थितियाँ नष्ट हो सकती हैं, पर कला और संस्कृति की आंतरिक शक्ति कभी नष्ट नहीं होती।

💡 लेखक का संदेश (सांस्कृतिक चेतना की अमरता)

"डॉ० शर्मा जी कहते हैं कि मनुष्य और परिस्थितियों का संबंध द्वंद्वात्मक है। परिस्थितियाँ मनुष्य को बदलती हैं, और मनुष्य परिस्थितियों को बदलता है। ठीक इसी प्रकार, समाज भले ही बदल जाए, लेकिन रामायण और महाभारत जैसे महान काव्यों का मूल्य सदियों बाद भी उतना ही कड़क और जीवंत रहता है, क्योंकि साहित्य इंसानी संवेदनाओं को अमर कर देता है।"

भारत की सांस्कृतिक एकता पर विचार करते हुए लेखक कहते हैं कि हमारे देश में विभिन्न भाषाएँ और बोलियाँ होने के बाद भी एक अटूट 'अखिल भारतीय सांस्कृतिक निरंतरता' है। यहाँ वाल्मीकि और व्यास की परंपरा ने पूरे देश के मानस को एक सूत्र में बांधा है। यदि हम ध्यान से देखें, तो दुनिया का कोई भी ऐसा देश नहीं है जिसकी राष्ट्रीय एकता भारत जितनी गहरी और मजबूत हो। जब हमारे ऊपर कोई बाहरी संकट आता है, तो बंगाली, पंजाबी, तमिल और हिंदी भाषी सब मिलकर एक सूत्र में खड़े हो जाते हैं। यह हमारी महान साहित्यिक परंपरा का ही प्रभाव है।

निबंध के अंत में डॉ० रामविलास शर्मा जी पुरजोर शब्दों में कहते हैं कि समाजवादी व्यवस्था ही साहित्य की परंपरा का सबसे सही और न्यायपूर्ण मूल्यांकन कर सकती है। पूंजीवादी व्यवस्था में जहाँ ज्ञान और कला पर अमीरों का एकाधिकार होता है, वहीं समाजवाद आने पर देश की आम जनता साक्षर होगी और वह महान साहित्यकारों की रचनाओं का असली आनंद ले पाएगी। भारत का भविष्य समाजवाद से जुड़ा हुआ है, जहाँ हमारी संस्कृति और अधिक निखरेगी। हमारी परंपरा बहुत समृद्ध है और भावी नागरिकों को इस पर पूरा गर्व होना चाहिए।

भाग ३: पाठ के अंत के प्रश्न-उत्तर (Bihar Board Exam Exercises)

💡 प्रत्येक प्रश्न के नीचे दिए गए बटन पर क्लिक करके बिहार बोर्ड परीक्षा मानक के अनुकूल उत्तर प्राप्त करें और उनका निरंतर अभ्यास करें।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

साहित्य की परंपरा का पूर्ण ज्ञान उन लोगों के लिए आवश्यक है जो समाज में क्रांतिकारी बदलाव लाना चाहते हैं, जो लकीर के फ़कीर नहीं हैं और जो रूढ़ियों को तोड़कर एक नया युग-परिवर्तक साहित्य रचना चाहते हैं। परंपरा के ज्ञान से ही वे सही और गलत मूल्यों में अंतर समझकर समाज का मार्गदर्शन कर सकते हैं।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

साहित्य की 'सापेक्ष स्वाधीनता' का अर्थ है कि साहित्य पूरी तरह सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों का गुलाम नहीं होता; उसका अपना एक स्वतंत्र अस्तित्व और प्रभाव होता है। उदाहरण के लिए, प्राचीन एथेंस की गुलामी के बाद भी वहाँ की कला और साहित्य आज भी अमर हैं और पूरे विश्व को प्रभावित करते हैं।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

भारत में अनेक भाषाएँ और संस्कृतियाँ होने के बावजूद वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, तुलसी और निराला जैसे महान साहित्यकारों की साझी विरासत ने पूरे देश को एक मजबूत सांस्कृतिक धागे में बांधा है। जब भी देश पर कोई संकट आता है, तो यही साहित्यिक चेतना हमारी राष्ट्रीय एकता का मुख्य आधार बनती है।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

लेखक के अनुसार, केवल 'समाजवादी व्यवस्था' ही साहित्य की परंपरा का सबसे सही और सच्चा मूल्यांकन कर सकती है। क्योंकि समाजवाद में शिक्षा और संस्कृति पर किसी अमीर वर्ग का एकाधिकार नहीं होता, बल्कि समाज का हर गरीब-मजदूर वर्ग साक्षर होकर ज्ञान और उच्च साहित्य का उपभोग कर सकता है।

भाग ४: शब्दार्थ (कठिन शब्दों के अर्थ)

लकीर के फ़कीर पुरानी रूढ़ियों या ढर्रे पर बिना सोचे-समझे चलने वाले।
सापेक्ष स्वाधीनता परिस्थितियों के प्रभाव में रहते हुए भी अपनी आज़ादी बनाए रखना।
द्वंद्वात्मक दो विरोधी ताकतों के बीच आपसी टकराव और विकास का संबंध।
कालजयी समय को जीतने वाली रचना, जो सदियों तक अमर रहे।
विघटन टूटने या अलग-अलग बिखरने की प्रक्रिया।
मीमांसा किसी विषय का गहराई से किया गया तार्किक विश्लेषण।