भाग २: मुख्य पाठ (निबंध का एक-एक शब्द)
जो लोग साहित्य में युग-परिवर्तन करना चाहते हैं, जो लकीर के फ़कीर नहीं हैं और जो क्रांतिकारी साहित्य रचना चाहते हैं, उनके लिए साहित्य की परंपरा का ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है। जो लोग समाज में बुनियादी बदलाव लाकर समाजवादी व्यवस्था कायम करना चाहते हैं, वे अतीत की महान सांस्कृतिक परंपराओं को छोड़े बिना ही आगे बढ़ सकते हैं। क्योंकि साहित्य की परंपरा का मूल्यांकन करते हुए हम सबसे पहले उस साहित्य का मूल्य निर्धारित करते हैं जो शोषक वर्गों के खिलाफ शोषित जनता के हितों को आवाज देता है।
लेखक स्पष्ट करते हैं कि साहित्य की धारा कभी भी सामाजिक परिस्थितियों से पूरी तरह कटकर अलग नहीं बह सकती। यद्यपि साहित्य सामाजिक आर्थिक परिस्थितियों से प्रभावित होता है, फिर भी इसकी अपनी एक 'सापेक्ष स्वाधीनता' होती है। इतिहास गवाह है कि गुलाम अमरीका ने एथेंस की सभ्यता को आर्थिक रूप से गुलाम बना लिया था, लेकिन एथेंस की कला और साहित्य की महानता के सामने वह खुद हमेशा बौना ही रहा। एथेंस की गुलामी के बाद भी वहाँ का साहित्य अमर रहा, जिससे पता चलता है कि भौतिक परिस्थितियाँ नष्ट हो सकती हैं, पर कला और संस्कृति की आंतरिक शक्ति कभी नष्ट नहीं होती।
"डॉ० शर्मा जी कहते हैं कि मनुष्य और परिस्थितियों का संबंध द्वंद्वात्मक है। परिस्थितियाँ मनुष्य को बदलती हैं, और मनुष्य परिस्थितियों को बदलता है। ठीक इसी प्रकार, समाज भले ही बदल जाए, लेकिन रामायण और महाभारत जैसे महान काव्यों का मूल्य सदियों बाद भी उतना ही कड़क और जीवंत रहता है, क्योंकि साहित्य इंसानी संवेदनाओं को अमर कर देता है।"
भारत की सांस्कृतिक एकता पर विचार करते हुए लेखक कहते हैं कि हमारे देश में विभिन्न भाषाएँ और बोलियाँ होने के बाद भी एक अटूट 'अखिल भारतीय सांस्कृतिक निरंतरता' है। यहाँ वाल्मीकि और व्यास की परंपरा ने पूरे देश के मानस को एक सूत्र में बांधा है। यदि हम ध्यान से देखें, तो दुनिया का कोई भी ऐसा देश नहीं है जिसकी राष्ट्रीय एकता भारत जितनी गहरी और मजबूत हो। जब हमारे ऊपर कोई बाहरी संकट आता है, तो बंगाली, पंजाबी, तमिल और हिंदी भाषी सब मिलकर एक सूत्र में खड़े हो जाते हैं। यह हमारी महान साहित्यिक परंपरा का ही प्रभाव है।
निबंध के अंत में डॉ० रामविलास शर्मा जी पुरजोर शब्दों में कहते हैं कि समाजवादी व्यवस्था ही साहित्य की परंपरा का सबसे सही और न्यायपूर्ण मूल्यांकन कर सकती है। पूंजीवादी व्यवस्था में जहाँ ज्ञान और कला पर अमीरों का एकाधिकार होता है, वहीं समाजवाद आने पर देश की आम जनता साक्षर होगी और वह महान साहित्यकारों की रचनाओं का असली आनंद ले पाएगी। भारत का भविष्य समाजवाद से जुड़ा हुआ है, जहाँ हमारी संस्कृति और अधिक निखरेगी। हमारी परंपरा बहुत समृद्ध है और भावी नागरिकों को इस पर पूरा गर्व होना चाहिए।