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बिहार बोर्ड कक्षा 10वीं हिंदी | गोधूलि भाग 2

अध्याय 08: जीत-जीत मैं निरखत हूँ

साक्षात्कार: पंडित बिरजू महाराज (रश्मि वाजपेयी द्वारा गृहीत)
न्यू स्टैंडअलोन डिजिटल संस्करण

भाग १: गुरु-शिष्य परिचय

जन्म तिथि चार फरवरी उन्नीस सौ अड़तीस (4 फरवरी 1938 ई०)
जन्म स्थान जफ़रिन अस्पताल, लखनऊ, उत्तर प्रदेश
महान घराना लखनऊ का कालका-बिन्दादीन घराना (सातवीं पीढ़ी)
निधन (मृत्यु) जनवरी दो हजार बाईस (17 जनवरी 2022 ई०)

कथक नृत्य के विश्वविख्यात सम्राट पंडित बिरजू महाराज का जन्म ४ फरवरी उन्नीस सौ अड़तीस (1938 ई०) में लखनऊ के जफ़रिन अस्पताल में सुबह आठ बजे वसंत पंचमी के एक दिन पहले हुआ था। वे लखनऊ घराने की कालका-बिन्दादीन परंपरा की सातवीं पीढ़ी के इकलौते चिराग थे। बिरजू महाराज के पिता और उनके चाचा (शंभू महाराज व लच्छू महाराज) अपने समय के देश के जाने-माने कड़क और मशहूर डांसर थे। बिरजू महाराज के पिता ही उनके पहले 'गुरु' थे, जिन्होंने उन्हें नृत्य की प्रारंभिक तालीम दी थी।

बिरजू महाराज का बचपन बहुत ही तंगहाली और संघर्षों में बीता। जब वे मात्र साढ़े नौ वर्ष के थे, तभी उनके पूज्य पिता का लू लगने के कारण आकस्मिक देहांत हो गया। पिता के श्राद्ध कर्म के लिए दस दिन के भीतर दो जगह प्रोग्राम करके उन्होंने पाँच सौ रुपये (500 रु०) इकट्ठे किए थे, जो उनके जीवन का सबसे भावुक और कड़ा इम्तिहान था। इसके बाद वे दिल्ली आ गए और संगीत भारती तथा बाद में कत्थक केंद्र में नृत्य सिखाने लगे।

प्रस्तुत पाठ 'जीत-जीत मैं निरखत हूँ' वास्तव में एक 'साक्षात्कार' (इंटरव्यू) है, जिसे उनकी शिष्या और मशहूर नृत्यांगना रश्मि वाजपेयी ने लिया है। इसमें महाराज जी ने अपने जीवन की खट्टी-मीठी यादों, अपने पूर्वजों की कला और कड़े रियाज़ के बारे में बहुत ही बेबाकी से बातें की हैं। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और पद्मविभूषण जैसे सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से सम्मानित इस महान कलाकार का १७ जनवरी दो हजार बाईस (2022 ई०) को दिल्ली में देहांत हो गया।

यह साक्षात्कार बिहार बोर्ड कक्षा 10वीं के छात्रों को यह सिखाता है कि सफलता रातों-रात नहीं मिलती, बल्कि उसके लिए खून-पसीना एक करके कड़ा अभ्यास और कला के प्रति अटूट निष्ठा रखनी पड़ती है। परीक्षा की दृष्टि से यह पाठ अत्यंत महत्वपूर्ण है।

पंडित बिरजू महाराज
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भाग २: मुख्य पाठ (साक्षात्कार का एक-एक शब्द)

रश्मि वाजपेयी बातचीत की शुरुआत करते हुए पूछती हैं कि "महाराज जी, आपकी नृत्य यात्रा की शुरुआत कहाँ से हुई और आपके जीवन में आपके माता-पिता का क्या स्थान रहा?" बिरजू महाराज मुस्कुराते हुए पुरानी यादों में खो जाते हैं और कहते हैं कि जब वे केवल सात-आठ साल के थे, तभी से उनके पिता ने उन्हें अपने साथ नाचना शुरू करवा दिया था। वे रामपुर के नवाब के यहाँ करीब बाईस साल तक रहे। रामपुर के नवाब को जब भी नृत्य देखना होता, वे उनके पिता को बुलावा भेज देते थे। महाराज जी कहते हैं कि उनके पिता स्वभाव के बहुत ही सीधे, सरल और कला के प्रति कड़क निष्ठा रखने वाले इंसान थे। उन्हें जब भी गुस्सा आता या वे उदास होते, तो सीधे रियाज़ करने बैठ जाते थे।

अपने पहले कड़े इम्तिहान को याद करते हुए महाराज जी बताते हैं कि जब वे संगीत भारती दिल्ली में नौकरी करने आए, तो उन्हें ढाई सौ रुपये (250 रु०) महीना मिलता था। वहाँ वे साइकिल से आते-जाते थे। कत्थक केंद्र में आने के बाद उनके जीवन को एक नई दिशा मिली। वे कहते हैं कि "लोग समझते हैं कि मुझे सबकुछ विरासत में बहुत आसानी से मिल गया, लेकिन मेरे पिता के जाने के बाद हमारी हालत ऐसी थी कि घर का किराया देने के पैसे नहीं थे। मेरी माँ ने बहुत कष्ट झेलकर मुझे इस मुकाम तक पहुँचाया। मेरी माँ ही मेरी सबसे बड़ी 'शागिर्द' और जज थीं। जब भी मैं नाचता, मैं माँ से पूछता था कि बाबूजी (पिताजी) की तरह सही नाच रहा हूँ न? और माँ कहती थी—हाँ बेटा, तुम बिल्कुल अपने पिता की हुबहू परछाई हो।"

💡 महाराज जी का संदेश (मेहनत का कोई शॉर्टकट नहीं)

"बिरजू महाराज कहते हैं कि चाहे कितनी भी बड़ी विरासत क्यों न हो, जब तक आप खुद पैर के छालों और कड़े रियाज़ (अभ्यास) से नहीं गुजरेंगे, तब तक कला आपके भीतर नहीं उतरेगी। वे रोजाना गर्मियों और सर्दियों में बिना नागा किए आठ-आठ घंटे लगातार रियाज़ करते थे, तभी आज उनका नाम पूरी दुनिया में गूंजता है।"

अपने शिष्यों और विदेशों के दौरों के बारे में बात करते हुए महाराज जी बताते हैं कि वे रूस, अमेरिका, इंग्लैंड, जापान और फ्रांस समेत दर्जनों देशों में भारतीय कत्थक नृत्य का परचम लहरा चुके हैं। विदेशी लोग भारतीय ताल, लय और टुकड़ों को देखकर हैरान रह जाते थे। उनके शिष्यों में वेरोनिक (एक विदेशी शिष्या), शाश्वती, दुर्गा और रश्मि वाजपेयी जैसी प्रतिभावान नृत्यांगनाएँ शामिल हैं। वे अपनी कला को लेकर बहुत गंभीर थे। वे न केवल नृत्य करते थे, बल्कि सितार, गिटार, तबला, सरोद और बांसुरी बजाने के भी शौकीन थे।

साक्षात्कार के अंत में पंडित बिरजू महाराज बड़े ही भावुक होकर कहते हैं कि "अब मेरा एक ही सपना है कि हमारी जो यह पूर्वजों की कड़क और शुद्ध कत्थक परंपरा है, इसे आने वाली पीढ़ी पूरी ईमानदारी से संभाले। आज के बच्चे शॉर्टकट ढूंढते हैं, जो कला के साथ अन्याय है। कला तो साधना मांगती है।" उन्होंने अपने जीवन के हर उतार-चढ़ाव को हंसकर झेला और अपनी कला को कभी बिकने नहीं दिया। यह पूरा पाठ हमें एक सच्चे और समर्पित कर्मयोगी की जीवन यात्रा का दर्शन कराता है।

भाग ३: पाठ के अंत के प्रश्न-उत्तर (Bihar Board Exam Exercises)

💡 प्रत्येक प्रश्न के नीचे दिए गए बटन पर क्लिक करके बिहार बोर्ड परीक्षा मानक के अनुकूल उत्तर प्राप्त करें और उनका निरंतर अभ्यास करें।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

बिरजू महाराज के जीवन में उनके माता-पिता का योगदान अद्वितीय था। उनके पिता उनके पहले गुरु थे, जिन्होंने बचपन में ही उन्हें नृत्य की कड़क बारीकियां सिखाई थीं। पिता के देहांत के बाद उनकी माँ ने विषम परिस्थितियों में भी उनका हौसला बढ़ाया और उनकी सबसे बड़ी पारखी और जज बनकर उनके हुनर को तराशा।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

जब महाराज जी मात्र साढ़े नौ वर्ष के थे, तब उनके पिता का लू लगने से देहांत हो गया था। घर में श्राद्ध कर्म के लिए पैसे नहीं थे। नन्हे बिरजू ने अपनी आँखों के आँसू पोंछकर दस दिनों के भीतर दो जगहों पर नृत्य के कड़क प्रोग्राम किए और पाँच सौ रुपये जुटाए। एक छोटे बच्चे द्वारा पिता की मृत्यु पर नाचकर पैसे जुटाना अत्यंत भावुक दृश्य था।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

महाराज जी अपनी माँ को अपना सबसे बड़ा शागिर्द और सच्चा जज मानते थे। वे जब भी कोई नया टुकड़ा या कठिन पदचाप करते, तो अपनी माँ को दिखाते और पूछते कि "मैं बाबूजी की तरह सही कर रहा हूँ न?" माँ हमेशा उनकी गलतियों को सुधारती और उनका मार्गदर्शन करती थी।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

रामपुर के नवाब के यहाँ उनके पिता ने बाईस वर्ष तक अपनी कला की सेवा की। नवाब साहब कला के कद्रदान तो थे, लेकिन वे जब चाहते तब असमय ही बुलावा भेज देते थे, जिससे उनके पिता को कभी-कभी अपनी स्वाधीनता छिनती महसूस होती थी। अंततः नवाब की नौकरी छूटने पर उनके पिता ने हनुमान जी को प्रसाद चढ़ाया था।

भाग ४: शब्दार्थ (कठिन शब्दों के अर्थ)

रियाज़ लगातार अभ्यास करना, साधना या ट्रेनिंग।
शागिर्द शिष्य, चेला या कला सीखने वाला छात्र।
साक्षात्कार इंटरव्यू, किसी के जीवन को जानने के लिए की गई बातचीत।
तंगहाली गरीबी, आर्थिक तंगी या तंग स्थिति।
परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही कला या रीति-रिवाज।
घराना संगीत या नृत्य की किसी खास शैली का पारिवारिक केंद्र।