भाग २: मुख्य पाठ (साक्षात्कार का एक-एक शब्द)
रश्मि वाजपेयी बातचीत की शुरुआत करते हुए पूछती हैं कि "महाराज जी, आपकी नृत्य यात्रा की शुरुआत कहाँ से हुई और आपके जीवन में आपके माता-पिता का क्या स्थान रहा?" बिरजू महाराज मुस्कुराते हुए पुरानी यादों में खो जाते हैं और कहते हैं कि जब वे केवल सात-आठ साल के थे, तभी से उनके पिता ने उन्हें अपने साथ नाचना शुरू करवा दिया था। वे रामपुर के नवाब के यहाँ करीब बाईस साल तक रहे। रामपुर के नवाब को जब भी नृत्य देखना होता, वे उनके पिता को बुलावा भेज देते थे। महाराज जी कहते हैं कि उनके पिता स्वभाव के बहुत ही सीधे, सरल और कला के प्रति कड़क निष्ठा रखने वाले इंसान थे। उन्हें जब भी गुस्सा आता या वे उदास होते, तो सीधे रियाज़ करने बैठ जाते थे।
अपने पहले कड़े इम्तिहान को याद करते हुए महाराज जी बताते हैं कि जब वे संगीत भारती दिल्ली में नौकरी करने आए, तो उन्हें ढाई सौ रुपये (250 रु०) महीना मिलता था। वहाँ वे साइकिल से आते-जाते थे। कत्थक केंद्र में आने के बाद उनके जीवन को एक नई दिशा मिली। वे कहते हैं कि "लोग समझते हैं कि मुझे सबकुछ विरासत में बहुत आसानी से मिल गया, लेकिन मेरे पिता के जाने के बाद हमारी हालत ऐसी थी कि घर का किराया देने के पैसे नहीं थे। मेरी माँ ने बहुत कष्ट झेलकर मुझे इस मुकाम तक पहुँचाया। मेरी माँ ही मेरी सबसे बड़ी 'शागिर्द' और जज थीं। जब भी मैं नाचता, मैं माँ से पूछता था कि बाबूजी (पिताजी) की तरह सही नाच रहा हूँ न? और माँ कहती थी—हाँ बेटा, तुम बिल्कुल अपने पिता की हुबहू परछाई हो।"
"बिरजू महाराज कहते हैं कि चाहे कितनी भी बड़ी विरासत क्यों न हो, जब तक आप खुद पैर के छालों और कड़े रियाज़ (अभ्यास) से नहीं गुजरेंगे, तब तक कला आपके भीतर नहीं उतरेगी। वे रोजाना गर्मियों और सर्दियों में बिना नागा किए आठ-आठ घंटे लगातार रियाज़ करते थे, तभी आज उनका नाम पूरी दुनिया में गूंजता है।"
अपने शिष्यों और विदेशों के दौरों के बारे में बात करते हुए महाराज जी बताते हैं कि वे रूस, अमेरिका, इंग्लैंड, जापान और फ्रांस समेत दर्जनों देशों में भारतीय कत्थक नृत्य का परचम लहरा चुके हैं। विदेशी लोग भारतीय ताल, लय और टुकड़ों को देखकर हैरान रह जाते थे। उनके शिष्यों में वेरोनिक (एक विदेशी शिष्या), शाश्वती, दुर्गा और रश्मि वाजपेयी जैसी प्रतिभावान नृत्यांगनाएँ शामिल हैं। वे अपनी कला को लेकर बहुत गंभीर थे। वे न केवल नृत्य करते थे, बल्कि सितार, गिटार, तबला, सरोद और बांसुरी बजाने के भी शौकीन थे।
साक्षात्कार के अंत में पंडित बिरजू महाराज बड़े ही भावुक होकर कहते हैं कि "अब मेरा एक ही सपना है कि हमारी जो यह पूर्वजों की कड़क और शुद्ध कत्थक परंपरा है, इसे आने वाली पीढ़ी पूरी ईमानदारी से संभाले। आज के बच्चे शॉर्टकट ढूंढते हैं, जो कला के साथ अन्याय है। कला तो साधना मांगती है।" उन्होंने अपने जीवन के हर उतार-चढ़ाव को हंसकर झेला और अपनी कला को कभी बिकने नहीं दिया। यह पूरा पाठ हमें एक सच्चे और समर्पित कर्मयोगी की जीवन यात्रा का दर्शन कराता है।