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बिहार बोर्ड कक्षा 10वीं हिंदी | गोधूलि भाग 2

अध्याय 09: आविन्यों

लेखक: अशोक वाजपेयी (यात्रा-वृत्तांत)
न्यू स्टैंडअलोन डिजिटल संस्करण

भाग १: लेखक परिचय

जन्म तिथि सोलह जनवरी उन्नीस सौ इकतालीस (16 जनवरी 1941 ई०)
जन्म स्थान दुर्ग, मध्य प्रदेश (मूल निवास: सागर, मध्य प्रदेश)
सर्वोच्च पद भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारी एवं महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति
राष्ट्रीय सम्मान साहित्य अकादमी पुरस्कार, दयावती मोदी कवि शेखर सम्मान, फ्रेंच सरकार का 'ऑफिसर ऑफ द ऑर्डर ऑफ आर्ट्स एंड लेटर्स'

हिंदी के आधुनिक प्रखर कवि, आलोचक और प्रख्यात संस्कृतिकर्मी अशोक वाजपेयी का जन्म १६ जनवरी उन्नीस सौ इकतालीस (1941 ई०) में मध्य प्रदेश के दुर्ग नामक स्थान पर हुआ था। उनकी माता का नाम निर्मला देवी और पिता का नाम परमानंद वाजपेयी था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गवर्नमेण्ट हाई स्कूल, सागर से हुई। इसके बाद उन्होंने सेंट स्टीफेंस कॉलेज, दिल्ली से अंग्रेजी साहित्य में एम० ए० किया। वे भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के एक बेहद कड़क और वरिष्ठ अधिकारी रहे हैं, जिन्होंने भारत सरकार के संस्कृति सचिव के रूप में कला और साहित्य की अभूतपूर्व सेवा की।

अशोक वाजपेयी जी का संपादन और सृजन कार्य अत्यंत विशाल है। वे 'समवेत', 'पहचान', 'पूर्वग्रह', 'बहुवचन' और 'कविता एशिया' जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं के कुशल संपादक रहे हैं। उनकी काव्य चेतना में आधुनिक जीवन का गहरा यथार्थ और कलात्मक सौंदर्य कूट-कूट कर भरा है। कलाओं के प्रति उनके इसी अगाध समर्पण के कारण उन्हें फ्रांस सरकार और पोलैंड सरकार द्वारा भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया जा चुका है।

उनकी प्रसिद्ध कृतियों में: शहर अब भी संभावना है, एक पतंग अनंत में, अगर इतने से, तत्पुरुष, कहीं नहीं वहीं, बहुरि अकेला, थोड़ी सी जगह जैसे बेजोड़ काव्य-संग्रह; तथा फिलहाल, कुछ पूर्वग्रह, समय से बाहर, कविता का गलियारा जैसे आलोचना ग्रंथ विशेष रूप से विख्यात हैं। उन्हें 'कहीं नहीं वहीं' कृति पर साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

प्रस्तुत पाठ 'आविन्यों' एक अत्यंत सुंदर और कड़क 'यात्रा-वृत्तांत' है। लेखक को फ्रांस की एक कला-संस्था द्वारा रोन नदी के किनारे बसे एक बेहद पुराने शहर 'आविन्यों' में रहने का आमंत्रण मिला था। वहाँ के एक एकांत ईसाई मठ (ला शत्रूज़) में रहकर लेखक ने मात्र उन्नीस दिनों में जो अद्भुत रचनाएँ कीं, यह पाठ उसी की जीवंत डायरी है। बिहार बोर्ड कक्षा 10वीं के छात्रों के लिए वैश्विक कला और सांस्कृतिक धरोहरों को समझने का यह एक अत्यंत कड़क और ज्ञानवर्धक पाठ है।

कवि अशोक वाजपेयी
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भाग २: मुख्य पाठ (यात्रा-वृत्तांत का एक-एक शब्द)

आविन्यों दक्षिण फ्रांस का एक पुराना और ऐतिहासिक शहर है। यह रोन नदी के किनारे बसा हुआ है। पुराने समय में यह कुछ दिनों तक ईसाइयों के पोप की राजधानी भी रहा था। अब यह शहर हर वर्ष गर्मियों में होने वाले एक बहुत बड़े अंतर्राष्ट्रीय थियेटर और कला महोत्सव के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। इस उत्सव के दौरान पूरे शहर की पुरानी इमारतें, गलियाँ और चर्च रंगमंच में बदल जाते हैं और दुनिया भर के नामचीन कलाकार वहाँ अपनी कला का प्रदर्शन करने आते हैं।

लेखक अशोक वाजपेयी बताते हैं कि उन्हें पीटर ब्रुक का एक विख्यात और विवादस्पद नाटक 'महाभारत' देखने के लिए आविन्यों आने का न्योता मिला था। वे वहाँ कुल उन्नीस दिन रहे—चौबीस अक्टूबर से दस नवंबर उन्नीस सौ चौरानवे तक। इस प्रवास के लिए उन्होंने आविन्यों के पास ही रोन नदी के दूसरी तरफ बसे एक बेहद पुराने ईसाई मठ 'ला शत्रूज़' को अपना ठिकाना बनाया। यह मठ चौदहवीं सदी में 'कार्तूसियन संप्रदाय' के संतों द्वारा बनवाया गया था, जो बाद में क्रांति के समय सरकारी संपत्ति बन गया था। अब उसे एक बेहद खूबसूरत सांस्कृतिक केंद्र (विला न्येव ले आविन्यों) में बदल दिया गया है, जहाँ दुनिया भर के लेखक और संगीतकार एकांत में रहकर अपनी साधना करते हैं।

💡 लेखक की वैचारिक अंतर्दृष्टि (नदी और कविता)

"अशोक वाजपेयी जी का मानना है कि जैसे रोन नदी सदियों से अविरल बह रही है और उसमें पानी कभी खत्म नहीं होता, ठीक उसी प्रकार मनुष्य के भीतर की रचनात्मक कविता और कला भी हमेशा बहती रहती है। नदी के किनारे बैठना नदी के साथ बहने जैसा है। एकांत में प्रकृति और कला मिलकर मनुष्य की आत्मा को और अधिक कड़क और सुंदर बना देती हैं।"

लेखक अपने इस उन्नीस दिनों के एकांत जीवन की दिनचर्या के बारे में बताते हुए कहते हैं कि वे अपने साथ भारी-भरकम सामान नहीं, बल्कि केवल हिंदी का एक टाइपराइटर, तीन-चार कड़क पुस्तकें और कुछ संगीत के कैसेट लेकर गए थे। वहाँ का माहौल इतना शांत और पवित्र था कि वे सुबह से रात तक केवल लेखन कार्य में डूबे रहते थे। इस अद्भुत एकांत और सृजनशीलता का परिणाम यह हुआ कि उन्होंने मात्र उन्नीस दिनों के भीतर पैंतीस (35) कविताएँ और सत्ताईस (27) कड़क गद्य रचनाएँ लिख डालीं। वे कहते हैं कि इतनी तेजी से और इतनी मात्रा में उन्होंने अपने जीवन में पहले कभी नहीं लिखा था।

यात्रा-वृत्तांत के अंत में लेखक आविन्यों शहर और ला शत्रूज़ मठ के प्रति अपनी गहरी कृतज्ञता प्रकट करते हैं। वे कहते हैं कि हर सुंदर और ऐतिहासिक शहर हमें अपनी यादों की ज़ंजीर में बांध लेता है। आविन्यों केवल पत्थरों का एक पुराना शहर नहीं है, बल्कि वह मानवीय कला, इतिहास और शांति का एक ऐसा जीवंत केंद्र है जो सरहदों को भूलकर पूरी दुनिया के दिलों को आपस में जोड़ता है। यह पाठ हमें अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों को सहेजने और उनका आदर करने की एक बहुत ही कड़क और दूरगामी शिक्षा देता है।

भाग ३: पाठ के अंत के प्रश्न-उत्तर (Bihar Board Exam Exercises)

💡 प्रत्येक प्रश्न के नीचे दिए गए बटन पर क्लिक करके बिहार बोर्ड परीक्षा मानक के अनुकूल उत्तर प्राप्त करें और उनका निरंतर अभ्यास करें।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

आविन्यों दक्षिण फ्रांस का एक अत्यंत प्राचीन, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक शहर है। यह प्रसिद्ध रोन नदी के किनारे स्थित है। पुराने समय में यह ईसाइयों के पोप की राजधानी रहा था और वर्तमान में यह अपने विश्वविख्यात वार्षिक अंतर्राष्ट्रीय थियेटर और कला महोत्सव के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

'ला शत्रूज़' आविन्यों के पास रोन नदी के पार स्थित एक अत्यंत प्राचीन ईसाई मठ है, जिसे चौदहवीं सदी में कार्तूसियन संप्रदाय के संतों ने बनवाया था। फ्रांसीसी क्रांति के समय इस पर जनता ने कब्जा कर लिया था और वर्तमान में इसे एक बेहद सुंदर अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक केंद्र में बदल दिया गया है, जहाँ कलाकार आकर एकांत साधना करते हैं।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

लेखक आविन्यों अपने साथ बहुत सीमित सामान लेकर गए थे, जिसमें हिंदी का एक टाइपराइटर, तीन-चार कड़क पुस्तकें और कुछ संगीत के कैसेट शामिल थे। वहाँ के १९ दिनों के अत्यंत एकांत और पवित्र माहौल का परिणाम यह हुआ कि उन्होंने रिकॉर्ड पैंतीस (35) कविताएँ और सत्ताईस (27) सुंदर गद्य रचनाएँ लिख डालीं।

विशेषज्ञ उत्तर (BSEB बोर्ड परीक्षा मानक)

लेखक के अनुसार, नदी और कविता में गहरी समानता है। जैसे नदी सदियों से निरंतर बहती आ रही है और उसकी धारा कभी खत्म नहीं होती, वैसे ही मनुष्य के भीतर की कविता और कला भी अविरल बहती रहती है। जैसे नदी विभिन्न संस्कृतियों को जोड़ती है, वैसे ही कविता भी इंसानी दिलों और इतिहास को एक सूत्र में पिरोकर रखती है।

भाग ४: शब्दार्थ (कठिन शब्दों के अर्थ)

प्रवास अपने मूल स्थान को छोड़कर कुछ दिनों के लिए बाहर रहना।
मठ धार्मिक संतों या भिक्षुओं के रहने का पवित्र स्थान या आश्रम।
सृजनशीलता नया निर्माण करने या नई रचनाएँ लिखने की भीतरी क्षमता।
अविरल बिना रुके लगातार बहने या चलने वाली धारा।
कृतज्ञता किसी के द्वारा किए गए उपकार या आदर के प्रति आभार प्रकट करना।
रंगमंच वह स्टेज या स्थान जहाँ नाटक और कलाओं का प्रदर्शन होता है।